श्री आंडाल तिरुप्पावै
पाशुरम् 04
आळि मळै क्कण्णा · ओन्रु नी कै करवेल ||
आळियुळ् पुक्कु · मुगंदु कोडार्त्तेरि ||
ऊळि मुदल्वन · उरुवम् पोल मेय् करुत्तु ||
पाळियन्दोळुडै · प्पर्बनाबन् कैयिल् ||
आळिपोल् मिन्नि · वलम्बुरि पोल निन्रतिरन्दु ||
ताळादे शार्ङ्गमुदैत्त · शरमळै पोल ||
वाळ उलकिनिल् · पेय्दिडाय् ||
नांगळुम् मार्गळि · नीराड मगिळन्दु || एलोर् एम्बावाय् ||
संकेतार्थ विवरण
· = शब्द विराम (सूक्ष्म विराम) | || = पूर्ण पाद विराम
पद - पदार्थ
आळि : समुद्र; मळै : वर्षा; क्कण्णा : हे कृष्ण, मेघवर्ण प्रभु; ओन्रु : एक भी; नी : तुम; कै : हाथ में; करवेल : मत रोको / मत छिपाओ; आळियुळ् : समुद्र में; पुक्कु : प्रवेश करके; मुगंदु : भरकर; कोडार्त्तेरि : ऊपर उठकर उमड़ना; ऊळि : प्रलय-काल; मुदल्वन : आदि कारण, परमात्मा; उरुवम् : रूप; पोल : के समान; मेय् : शरीर; करुत्तु : काला होकर; पाळियन्दोळुडै : शेषनाग पर शयन करने वाले; प्पर्बनाबन् : पद्मनाभ (श्रीहरि); कैयिल् : हाथ में; आळिपोल् : बिजली की तरह; मिन्नि : चमकते हुए; वलम्बुरि पोल : शंख की भाँति; निन्रतिरन्दु : गड़गड़ाते हुए; ताळादे : बिना रुके; शार्ङ्गम् : शार्ङ्ग धनुष; उदैत्त : छोड़ा हुआ; शरम् : बाण; मळै पोल : धारावाहिक वर्षा की तरह; वाळ : जीवित रहने के लिए; उलकिनिल् : संसार में; पेय्दिडाय् : बरसाओ; नांगळुम् : हम भी; मार्गळि : मार्गशीर्ष मास में; नीराड : व्रत-स्नान करने हेतु; मगिळन्दु : आनंदपूर्वक; एलोर् एम्बावाय् : हे सखी, हमारे व्रत को सिद्ध करो।
अर्थ (सरल हिन्दी विवरण)
इस पाशुरम् में आंडाळ, श्रीकृष्ण को आळि मळै क्कण्णा कहकर संबोधित करती हैं और उनसे वर्षा कराने की प्रार्थना करती हैं। यह केवल वर्षा के लिए की गई सामान्य प्रार्थना नहीं है, बल्कि इसमें लोक-जीवन और धर्म के संरक्षण का भाव निहित है। आंडाळ कहती हैं कि प्रभु समुद्र में प्रवेश कर, उससे जल ग्रहण कर, प्रलयकाल के परमात्मा के समान गहरे, गंभीर रूप धारण करें और बिजली, गर्जना तथा बाणों की वर्षा जैसी निरंतर धाराओं के रूप में बिना रुके वर्षा करें। ऐसी वर्षा से संसार जीवित रहेगा, कृषि फलेगी और सामाजिक जीवन सुचारु रूप से चलेगा।
आंडाळ यह भी स्पष्ट करती हैं कि जब लोक-धर्म और प्रकृति का संतुलन बना रहेगा, तभी मार्गशीर्ष मास में हम आनंदपूर्वक स्नान कर पावै व्रत का पालन कर सकेंगे। इस प्रकार व्रत की सफलता केवल व्यक्तिगत प्रयास पर नहीं, बल्कि ईश्वर की कृपा, प्रकृति के क्रम और लोक-कल्याण पर निर्भर है। यह पाशुरम् सिखाता है कि भक्ति आत्मकेंद्रित नहीं, बल्कि संसार के हित से जुड़ी हुई साधना है।
महत्वपूर्ण हिंदी भाषा टिप्पणियाँ
आज्ञासूचक और विश्वासपूर्ण भाषा : इस पाशुरम् की भाषा शरणागत भक्त की दृढ़ आस्था को प्रकट करती है; “आळि मळै क्कण्णा” : श्रीकृष्ण को मेघस्वरूप ईश्वर के रूप में संबोधित करना, जिससे प्रकृति और परमात्मा की एकता स्पष्ट होती है; “ओन्रु नी कै करवेल” : विनयपूर्ण याचना नहीं, बल्कि पूर्ण विश्वास से निकली हुई आज्ञा, जो प्रपत्ति भाव को दर्शाती है; क्रियापदों की शृंखला : समुद्र में प्रवेश करना, भरना और ऊपर उठना—वर्षा प्रक्रिया को क्रमबद्ध और सजीव बनाती है; प्रलयकाल की उपमा : बादलों की गंभीरता और सामर्थ्य को भाषा के स्तर पर सशक्त करती है; शेषशायी पद्मनाभ : प्रकृति की सभी क्रियाओं का ईश्वर-नियंत्रण संकेतित करता है; बिजली, शंख और बाण के उपमान : दृश्य और श्रव्य प्रभाव को तीव्र बनाते हैं; “ताळादे” : निरंतरता का सूचक शब्द, जो बिना रुके होने वाली वर्षा का भाव देता है; “नांगळुम् मार्गळि नीराड” : सामूहिक साधना और काल-सूचकता को जोड़ते हुए इस पाशुरम् को व्यक्तिगत प्रार्थना से ऊपर उठाकर सामूहिक व्रत-आह्वान बना देता है।
श्रीवैष्णव संप्रदाय व्याख्या
इस पाशुरम् में श्रीवैष्णव संप्रदाय यह स्पष्ट करता है कि प्रकृति की प्रत्येक क्रिया परमात्मा के अधीन है और कोई भी शक्ति स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं करती। वर्षा, मेघ, बिजली और गर्जना सब श्रीमन नारायण की इच्छा से ही प्रकट होते हैं। शरणागति का भाव यहाँ विशेष रूप से उभरता है, जहाँ भक्त ईश्वर से संकोच या भय के बिना निवेदन करता है, क्योंकि वह स्वयं को पूर्णतः आश्रित मानता है। समुद्र को कारण रूप और वर्षा को कार्य रूप मानकर आचार्य यह समझाते हैं कि कारण और कार्य दोनों पर ईश्वर का ही नियंत्रण है। शेषशायी नारायण का स्मरण यह संकेत देता है कि सृष्टि, स्थिति और लय सभी उनके लीला रूप हैं। इस पाशुरम् में भक्त व्यक्तिगत सुख के लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण लोक के जीवन और धर्म की रक्षा के लिए वर्षा की कामना करता है। श्रीवैष्णव दृष्टि में यही सच्ची भक्ति है, जहाँ कर्तव्य, लोकहित और कैंकऱ्य भाव परस्पर अलग नहीं होते, बल्कि एक दूसरे से गहराई से जुड़े रहते हैं।
गद्य रूप में भाव सार
इस पाशुरम् का भाव यह है कि भक्ति को जीवन से अलग करके नहीं देखा जा सकता। जब तक प्रकृति संतुलित रहती है और वर्षा समय पर होती है, तभी संसार का जीवन चलता है और धर्म स्थिर रहता है। यह संतुलन किसी संयोग से नहीं, बल्कि परमात्मा की इच्छा से बना रहता है। इसलिए भक्त सीधे प्रभु का आश्रय लेकर उनसे निरंतर और पर्याप्त वर्षा की कामना करता है, ताकि भूमि उपजाऊ रहे और सभी प्राणी जीवित रह सकें। जब लोकजीवन सुरक्षित होता है, तभी साधक आनंदपूर्वक व्रत, अनुशासन और सेवा का आचरण कर पाता है। इस प्रकार यह पाशुरम् सिखाता है कि सच्ची भक्ति केवल व्यक्तिगत मोक्ष की कामना नहीं है, बल्कि लोककल्याण से जुड़ी हुई ईश्वर-आश्रित जीवन-दृष्टि है।
दैनिक आत्मचिंतन (वैकल्पिक)
आज मैं यह विचार करता हूँ कि मेरी प्रार्थनाएँ केवल मेरी आवश्यकताओं तक सीमित तो नहीं हैं। क्या मेरी साधना में समाज, प्रकृति और अन्य जीवों के हित का भाव भी सम्मिलित है। मैं यह भी देखता हूँ कि मेरे आचरण और अनुशासन ईश्वर पर पूर्ण आश्रय से प्रेरित हैं या केवल आदतवश किए जा रहे हैं। क्या मैं अपने जीवन को इस प्रकार ढाल रहा हूँ कि उससे लोककल्याण और सेवा का भाव प्रकट हो। इस आत्मचिंतन के माध्यम से मैं यह संकल्प करता हूँ कि मेरी भक्ति प्रतिदिन अहंकार से मुक्त, कृतज्ञता से परिपूर्ण और सबके हित की भावना से युक्त हो।
