श्री आंडाल तिरुप्पावै

पाशुरम् 05

मायनै · मन्नु वडमदुरै · मैन्दनै ||
तूय पेरुनीर · यमुनेट् तुरैवनै ||
आयर कुलत्तिनिल् · तोन्रुम् अणि विळक्कै ||
तायैक् कुडल् विळक्कं · सेयिद दामोदरनै ||
तूयोमाय् वन्दु नाम् · तू मलर् तूवित्तोऴुदु ||
वायिनाल् पाडि · मनत्तिनाल् सिंधिक्क ||
पोय पिळैयुम् · पुकुतरुवान् निन्रनवुम् ||
तीयिनिल् तूसागुम् · सेप्पेलोर् एम्पावाय् ||

संकेतार्थ विवरण

· = शब्द विराम (सूक्ष्म विराम) | || = पूर्ण पाद विराम

पद - पदार्थ

मायनै : मायालीलाएँ करने वाले; मन्नु वडमदुरै मैन्दनै : शाश्वत उत्तर मथुरा में अवतरित पुत्र को; तूय पेरुनीर यमुनेट् तुरैवनै : पवित्र यमुना नदी के तट पर निवास करने वाले को; आयर कुलत्तिनिल् तोन्रुम् अणि विळक्कै : गोप कुल में प्रकट होने वाले शोभायमान दीपक को; तायैक् कुडल् विळक्कं सेयिद दामोदरनै : माता के गर्भ को प्रकाशमान करने वाले दामोदर को; तूयोमाय् वन्दु नाम् : शुद्ध भाव से हम आकर; तू मलर् तूवित्तोऴुदु : निर्मल पुष्प अर्पित कर प्रणाम करते हुए; वायिनाल् पाडि : मुख से गान करते हुए; मनत्तिनाल् सिंधिक्क : मन से ध्यान करते हुए; पोय पिळैयुम् पुकुतरुवान् निन्रनवुम् : पापों को दूर कर कृपा प्रदान करने वाले को स्मरण करते हुए; तीयिनिल् तूसागुम् सेप्पेलोर् एम्पावाय् : मंगल फल प्राप्त होगा ऐसा कहें, हे पावै।

अर्थ (सरल हिन्दी विवरण)

इस पाशुरम में गोपियाँ कृष्ण को अपने हृदय के अत्यंत निकट अनुभव करती हैं। वे उन्हें लीलाओं से भरपूर, यमुना के तट पर विहार करने वाले, गोप कुल का प्रकाश और माता के प्रेम से बँधे बालक के रूप में स्मरण करती हैं। यह स्मरण डर या दूरी से नहीं, बल्कि अपनापन और भरोसे से भरा हुआ है।

शुद्ध मन से आकर, फूल अर्पित करके, गाते हुए और मन में उनका चिंतन करते हुए आगे बढ़ने पर भीतर की गलतियाँ धीरे-धीरे दूर हो जाती हैं। यह पाशुरम यह भाव जगाता है कि सच्चे मन से की गई भक्ति स्वयं जीवन को शुद्ध करती है और करुणा अपने आप मिलने लगती है।

महत्वपूर्ण हिंदी भाषा टिप्पणियाँ

इस पाशुरम में मायनै : लीलामय स्वभाव को व्यक्त करने वाला शब्द; मन्नु वडमदुरै : स्थायित्व और दिव्यता को सूचित करने वाला स्थानवाचक प्रयोग; तूय पेरुनीर : पवित्रता पर विशेष बल देने वाला विशेषण युग्म; यमुनेट् तुरैवनै : नदी–तट से जुड़े निवास भाव को प्रकट करने वाली संरचना; आयर कुलत्तिनिल् तोन्रुम् : वंश और समुदाय से संबंध दिखाने वाला पदसमूह; अणि विळक्कै : शोभा और प्रकाश का बिंब रचने वाला रूपक; तायैक् कुडल् विळक्कं सेयिद : माता–पुत्र संबंध को कोमलता से उभारने वाला वाक्यांश; तूयोमाय् वन्दु नाम् : सामूहिक सहभागिता और शुद्ध भाव को दर्शाने वाला बहुवचन प्रयोग; वायिनाल् पाडि – मनत्तिनाल् सिंधिक्क : वाणी और मन की एकता दिखाने वाली समानांतर रचना; सेप्पेलोर् एम्पावाय् : संवादात्मक और आमंत्रणात्मक समापन शैली का संकेत।

श्रीवैष्णव संप्रदाय व्याख्या

इस पाशुरम में आंडाल गोपियों के मुख से शरणागति के सहज स्वरूप को प्रकट करती हैं। भगवान लीलाओं से युक्त होकर भी भक्त के लिए पूर्णतः विश्वसनीय आश्रय हैं यह भाव यहाँ शांत रूप से उभरता है। गोकुल में अवतरित होकर माता के प्रेम से बँधे दामोदर यह दिखाते हैं कि परमात्मा अपनी महिमा छिपाकर भक्त के निकट आते हैं और उसी निकटता में कृपा का प्रवाह होता है। वाणी से कीर्तन और मन से स्मरण जब एक साथ होते हैं तब अहंकार और पूर्व दोष अपने आप ढीले पड़ते हैं। आचार्यों के अनुसार यह पाशुरम बताता है कि कर्म का आग्रह नहीं बल्कि विनम्र भक्ति ही भगवान को बाँधती है और वही जीव के लिए सुरक्षित मार्ग बनती है।

गद्य रूप में भाव सार

यह पाशुरम यह अनुभूति कराता है कि भगवान को दूर और भयपूर्ण रूप में नहीं, बल्कि अत्यंत स्नेहपूर्ण और सुलभ रूप में स्मरण किया जा सकता है। जब मन, वाणी और भाव एक दिशा में प्रवाहित होते हैं, तब भक्ति सहज बन जाती है और भीतर की उलझनें धीरे-धीरे शान्त होने लगती हैं। अपने दोषों में उलझे रहने के बजाय शुद्ध भाव से आगे बढ़ना ही इस पाशुरम का मूल संकेत है, जहाँ करुणा प्रयास से नहीं बल्कि निकटता से प्रकट होती है।

दैनिक आत्मचिंतन (वैकल्पिक)

आज मैं यह देख सकता हूँ कि मेरे भीतर ईश्वर के प्रति अपनापन कितना है। क्या मेरे शब्द, विचार और भाव एक ही दिशा में बह रहे हैं, यह शान्त मन से समझने का प्रयास करूँ। बीते दोषों को पकड़कर बैठने के बजाय क्या मैं सरल और शुद्ध भाव से आगे बढ़ पा रहा हूँ। दिन के अंत में यह अनुभव करूँ कि भीतर की शान्ति कहाँ से जन्म ले रही है।

पाशुरम् मार्गदर्शन

Scroll to Top