मार्गशीर्ष (मर्गज़ी) मास में गाई जाने वाली तिरुप्पावै श्री वैष्णव परंपरा का एक अत्यंत पवित्र स्तोत्र-संग्रह है।
इन तीस पाशुरमों में श्री आंडाल गोपियों के रूप में आत्माओं को लेकर श्रीकृष्ण (श्रीमान नारायण) की शरणागति, भक्ति, व्रत और दिव्य प्रेम का उपदेश देती हैं।
तिरुप्पावै का नियमित पाठ —
भक्ति को शुद्ध करता है
शरणागति भाव को दृढ़ करता है
गृहस्थों और साधकों दोनों के लिए मंगलकारी माना जाता है
तिरुप्पावै के 30 पाशुरम
01. मार्गज़ी तिंगल
02. वैत्तु वाज़्वीरगल
03. ओंगी उलागलंद
04. आज़ी मझै कन्ना
05. मायनै मन्नु
06. पुल्लुम सिलंबिन काण
07. कीसू कीसेंदु
08. कीज़ वानम
09. तूमणि माडत्तु
10. नोट्रु चुवर्गम
11. कत्रु करवै
12. कनैत्तु इलम कत्रु
13. पुल्लिन वाय कींदानै
14. उंगल पुझक्कड़ै
15. एल्ले इलंगिलिये
16. नायकनाय निंद्र
17. अंबरमे तन्नीर
18. उन्दु मदकलित्रन
19. कुत्तु विलक्केरिय
20. मुप्पत्तु मूवर
21. एत्र कलंगल
22. अंगन मा ज्ञानत्तु
23. मारिमलै मुझंजिल
24. अन्रु इव्वुलगम
25. ओरुत्ति मगनाय
26. मालै मुडि मन्नन
27. कूड़ारै वेल्लुम
28. करवाइगल पिन्सेंदु
29. सिट्टम सिरुकाले
30. वंग कडल कडैंद
