श्री आंडाल तिरुप्पावै
पाशुरम् 01
मार्गळि तिङ्गळ् · मदि निऱैन्द नन्नाळाल् ॥
नीराड प्पोदुवीर् · पोदुमिनो · नेरिळैयीर् ॥
सीर् मल्गुम् आय्प्पाडि · सेल्व चिऱुमीर्गळ् ॥
कूर् वेल्कोडुन्दोळिलन् · नन्दगोपन् कुमारन् ॥
एरारन्द कन्नि · यशोदै इळं सिङ्गम् ॥
कार् मेनि · शेंगण् · कदिर् मदियम्बोल् मुगत्तान् ॥
नारायणने | नमक्के | पऱै तरुवान् ॥
पारोर् पुगळप्पडिन्दु ॥ एलोर् एम्पावाय् ॥
संकेतार्थ विवरण
· = शब्द विराम (सूक्ष्म विराम) | || = पूर्ण पाद विराम
पद - पदार्थ
मार्गळि तिङ्गळ् : मार्गशीर्ष मास; मदि निऱैन्द नन्नाळाल् : पूर्ण चंद्र से युक्त शुभ दिन पर; नीराड प्पोदुवीर् : पवित्र स्नान के लिए सिद्ध भक्तों को संबोधित करते हुए; पोदुमिनो : आइए; नेरिळैयीर् : सुंदर युवतियों से संबोधन; सीर् मल्गुम् आय्प्पाडि : ऐश्वर्य से युक्त आय्प्पाडि ग्राम; सेल्व चिऱुमीर्गळ् : सौभाग्यशाली बालिकाओं से संबोधन; कूर् वेल् कोडुन्दोळिलन् : तीक्ष्ण आयुधों से युक्त रक्षक; नन्दगोपन् कुमारन् : नंदगोप के पुत्र; एरारन्द कन्नि : अनुपम सौंदर्य वाली युवती; यशोदै इळं सिङ्गम् : यशोदा देवी का सिंह समान पुत्र; कार् मेनि : मेघवर्ण शरीर वाले; शेंगण् : करुणा से युक्त लाल नेत्रों वाले; कदिर् मदि अम्बोल् मुगत्तान् : सूर्य और चंद्र के समान तेजस्वी मुख वाले; नारायणने : वही श्रीमन्नारायण; नमक्के : हमारे लिए; पऱै तरुवान् : इच्छित फल प्रदान करने वाले; पारोर् पुगळप्पडिन्दु : समस्त लोकों में कीर्ति प्राप्त करने वाले; एलोर् एम्पावाय् : पावै व्रत में सम्मिलित होइए।
अर्थ (सरल हिन्दी विवरण)
मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा से युक्त इस शुभ दिन पर, पावै व्रत का आचरण करने के लिए तैयार सद्गुणों से युक्त युवतियों को आंडाल आह्वान करती हैं। वे यह दृढ़तापूर्वक घोषित करती हैं कि आय्प्पाडि में निवास करने वाली ये सौभाग्यशाली बालिकाएँ यदि नंदगोप के पुत्र श्रीकृष्ण की शरण लें, तो वही उन्हें इच्छित परम फल प्रदान करेंगे। इस व्रत के माध्यम से संपूर्ण लोकों में कीर्ति प्राप्त कराने वाली दिव्य अनुग्रह की प्राप्ति होती है—यह सत्य आंडाल सिखाती हैं।
महत्वपूर्ण हिंदी भाषा टिप्पणियाँ
मार्गळि तिङ्गळ् : आध्यात्मिक साधना के लिए अत्यंत अनुकूल मास; नीराड प्पोदुवीर् : बाह्य स्नान नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धि का संकेत; आय्प्पाडि : भक्ति से परिपूर्ण सामूहिक जीवन-पद्धति; नारायणने नमक्के पऱै तरुवान् : केवल श्रीमन्नारायण ही शरण्य हैं — यही सिद्धांत.
श्रीवैष्णव संप्रदाय व्याख्या
इस प्रथम पाशुरम् में आंडाल पावै व्रत का आह्वान करते हुए शरणागति के सिद्धांत को स्थापित करती हैं। वे स्पष्ट करती हैं कि व्रत का फल केवल व्यक्तिगत प्रयास से नहीं मिलता, बल्कि वह केवल श्रीमन्नारायण की अनुग्रह से ही सिद्ध होता है। सामूहिक भक्ति, विनय और दैवी आश्रय—यही इस पाशुरम् का मूल भाव है।
गद्य रूप में भाव सार
आंडाल मार्गशीर्ष मास को भक्ति-साधना का द्वार बताती हैं। वे आय्प्पाडि की सभी गोपिकाओं को एकत्रित होकर नंदगोप के पुत्र श्रीकृष्ण की शरण लेने के लिए बुलाती हैं और घोषित करती हैं कि वही परम पुरुषार्थ प्रदान करने वाले हैं। यह व्रत केवल व्यक्तिगत प्रयास नहीं है; यह समर्पण से युक्त अनुग्रह का मार्ग है।
दैनिक आत्मचिंतन (वैकल्पिक)
आज मैं अपने प्रयासों पर नहीं, बल्कि श्रीमन्नारायण की अनुग्रह पर कितना विश्वास रखता हूँ?
