श्री आंडाल तिरुप्पावै

पाशुरम् 02

वैयत्तु·वाऴ्वीरगाळ्·नामुं·नम्·पावैक्कु ||
सेय्युं·किरिसैगळ्·केळीरॊ·पार्कडलुल् ||
पैयत्तु·तुयिन्र·परमनडि·पाडि ||
नेय्युन्नोम्·पालुन्नोम्·नाड्काले·नीराडि ||
मैयिट्टु·एऴुतोम्·मलरिट्टु·नाम्·मुड़ियोम् ||
सेय्यातन·सेय्योम्·तीक्कुरळै·चेन्द्रोतोम् ||
अय्यमुं·पिच्चैयुं·आंतनैयुं·कैकट्टि ||
उय्युमारु·एण्णि·उगंदेलोर्·एम्बावाय् ||

संकेतार्थ विवरण

· = शब्द विराम (सूक्ष्म विराम) | || = पूर्ण पाद विराम

पद - पदार्थ

वैयत्तु वाऴ्वीरगाळ् : इस संसार में जीवन बिताने वाले लोगों को संबोधित सार्वभौमिक आह्वान; नामुं : हम भी; नम् : हमारा; पावैक्कु : पावै व्रत के लिए; सेय्युं : किए जाने वाले; किरिसैगळ् : नियमबद्ध आचरण और अनुशासित कर्म; केळीरॊ : कृपया सुनिए; पार्कडलुल् : क्षीरसागर में; पैयत्तु : शांत रूप से; तुयिन्र : योगनिद्रा में स्थित; परमनडि : परमात्मा के पवित्र चरण, जो परम शरण हैं; पाडि : स्तुति करते हुए; नेय्युन्नोम् : घी का सेवन न करना; पालुन्नोम् : दूध का सेवन न करना; नाड्काले : प्रातःकाल; नीराडि : स्नान करके; मैयिट्टु : नेत्र-अलंकरण (काजल) धारण करना; एऴुतोम् : हम नहीं करते; मलरिट्टु : पुष्प धारण करना; नाम् : हम; मुड़ियोम् : केश-सज्जा करना; सेय्यातन : जो नहीं किए जाने चाहिए; सेय्योम् : हम नहीं करते; तीक्कुरळै : कठोर या असत्य वचन; चेन्द्रोतोम् : हम नहीं बोलते; अय्यमुं : अन्नदान; पिच्चैयुं : भिक्षादान; आंतनैयुं : ब्राह्मणों और योग्य अतिथियों को; कैकट्टि : अपने हाथों से देकर; उय्युमारु : मोक्ष का मार्ग; एण्णि : चिंतन करते हुए; उगंदेलोर् : आनंदपूर्वक स्वीकार करो; एम्बावाय् : हे पावै! (व्रत में सम्मिलित होने का स्नेहपूर्ण आह्वान)।

अर्थ (सरल हिन्दी विवरण)

इस पाशुरम् में आंडाल संसार में रहने वाले सभी लोगों को संबोधित करते हुए पावै व्रत की भावना को स्पष्ट करती हैं। यह व्रत केवल बाहरी आचारों या दिखावे के लिए नहीं है, बल्कि मन, वाणी और कर्म की शुद्धि का मार्ग है। साधक प्रातःकाल स्नान कर भगवान का स्मरण करते हैं, घी-दूध जैसे भोगों का त्याग करते हैं, शृंगार और अनुचित वचन से दूर रहते हैं तथा संयमित जीवन अपनाते हैं। साथ ही अन्नदान और अतिथि-सत्कार के द्वारा करुणा और उदारता का विकास करते हैं। इस प्रकार यह पाशुरम् सिखाता है कि साधना स्वयं लक्ष्य नहीं है; वह तो हृदय को तैयार करने का साधन है, ताकि जीव भगवान की कृपा पर पूर्ण भरोसा रखते हुए मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर हो सके।

महत्वपूर्ण हिंदी भाषा टिप्पणियाँ

वैयत्तु वाऴ्वीरगाळ् : भाषा के स्तर पर यह संबोधन केवल गोपियों तक सीमित न होकर, संसार में रहने वाले सभी साधकों को सम्मिलित करता है; पावैक्कु : किसी एक दिन के व्रत के स्थान पर, अनुशासित और मूल्य-आधारित जीवन-पद्धति का संकेत; किरिसैगळ् : सामान्य कर्म नहीं, बल्कि नियमबद्ध और संयमित आचरण को सूचित करने वाला शब्द-प्रयोग; पार्कडलुल् पैयत्तु तुयिन्र परमनडि : भगवान के शांत, करुणामय और सुलभ स्वरूप को व्यक्त करने वाली कोमल भाषा-छवि; नेय्युन्नोम् पालुन्नोम् : भोग-त्याग को दर्शाने वाला निषेधात्मक वाक्य-विन्यास, जो साधना की दिशा स्पष्ट करता है; नाड्काले नीराडि : दिनचर्या में शुद्धता और क्रमबद्धता के भाषाई संकेत; सेय्यातन सेय्योम् तीक्कुरळै चेन्द्रोतोम् : नैतिक अनुशासन को वाणी और कर्म दोनों स्तरों पर स्थापित करने वाला संयोजित प्रयोग; अय्यमुं पिच्चैयुं आंतनैयुं कैकट्टि : दान और अतिथि-सत्कार को जीवन का स्वाभाविक गुण मानने की सांकेतिक भाषा; उय्युमारु एण्णि : मोक्ष को लक्ष्य मानकर की गई अंतर्मुखी साधना का भाषिक संकेत; एम्बावाय् : आदेश नहीं, बल्कि स्नेहपूर्ण और सामूहिक आमंत्रण सूचित करने वाला संबोधन।

श्रीवैष्णव संप्रदाय व्याख्या

श्रीवैष्णव संप्रदाय में यह पाशुरम् शरणागति के सिद्धांत की भूमिका के रूप में समझा जाता है। आंडाल द्वारा बताए गए नियम स्वयं मोक्ष का साधन नहीं हैं; वे जीव के अहंकार को शिथिल कर दास्य-भाव को दृढ़ करने वाले अभ्यास मात्र हैं। “घी और दूध का त्याग” जैसे निषेध केवल तपस्या नहीं, बल्कि भोग-त्याग के माध्यम से भगवान पर निर्भरता को सुदृढ़ करने के उपाय हैं। दान और अतिथि-सत्कार जैसे कर्म जीव की स्वार्थवृत्ति को कम कर यह बोध कराते हैं कि वह परमात्मा का शेष (शेषत्व) है। श्रीवैष्णव आचार्यों के अनुसार उपाय जीव का प्रयास नहीं, बल्कि उपेय के रूप में भगवान की कृपा ही निर्णायक है। यह पाशुरम् उसी सत्य को नियमों के रूप में सिखाते हुए, जीव को अंतर्मुखी रूप से पूर्ण शरणागति के लिए तैयार करता है।

गद्य रूप में भाव सार

यह पाशुरम् पावै व्रत को केवल बाहरी नियमों का संग्रह नहीं, बल्कि जीवन को भीतर से शुद्ध करने वाली अनुशासित साधना के रूप में प्रस्तुत करता है। आंडाल साधकों को सिखाती हैं कि संयम, शुद्ध आचरण, वाणी पर नियंत्रण और दान–अतिथि-सत्कार जैसे गुण मन को विनम्र बनाते हैं और अहंकार को धीरे-धीरे क्षीण करते हैं। भोगों का त्याग और नियमित आचरण स्वयं लक्ष्य नहीं हैं; वे हृदय को तैयार करने के साधन हैं, ताकि जीव अपनी सीमाओं को पहचानते हुए भगवान की कृपा पर पूर्ण आश्रय रख सके। इस प्रकार यह पाशुरम् बताता है कि जब जीवन में अनुशासन और करुणा एक साथ विकसित होते हैं, तब शरणागति स्वाभाविक बनती है और मोक्ष का मार्ग स्पष्ट होता है।

दैनिक आत्मचिंतन (वैकल्पिक)

आज अपनी दिनचर्या और साधना को देखते हुए, क्या मैं अपने अनुशासन और संयम को केवल बाहरी नियमों तक सीमित कर रहा हूँ, या वे वास्तव में मेरे अहंकार को कम कर भगवान पर निर्भरता बढ़ा रहे हैं? क्या दान, संयम और वाणी पर नियंत्रण मेरे जीवन में शरणागति को सहज और आनंदपूर्ण बना रहे हैं?

पाशुरम् मार्गदर्शन

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