श्री आंडाल तिरुप्पावै
पाशुरम् 03
ओंगी·उलागलंद·उत्तमन·पेर्·पाडि ||
नांगळ्·नम्·पावैक्कु·चाट्रि·नीराडिनाल् ||
तींगिन्रि·नाडेल्लाम्·तिंगळ्·मुम्मारि·पेय्दु ||
ओंगु·पेरुंचेन्नेल्·ऊडु·कयल्·उगळ ||
पूंगुवळै·पोदिल्·पोरिवण्डु·कन·पडुप्प ||
तेङ्गादे·पुक्किरुंदु·सीर्·मुलै·पैत्र ||
पांगय·नेडुंकण्·सेन्नि·पशुम्·पेनै ||
आंगु·अप्पोल्·मारैन्दिरुंदु·एम्बावाय् ||
संकेतार्थ विवरण
· = शब्द विराम (सूक्ष्म विराम) | || = पूर्ण पाद विराम
पद - पदार्थ
ओंगी : ऊँचा उठकर; उलागलंद : तीनों लोकों को नापने वाले; उत्तमन : परम पुरुष; पेर् : नाम; पाडि : गाते हुए; नांगळ् : हम; नम् : हमारा; पावैक्कु : पावै-व्रत के लिए; चाट्रि : विधिवत संकल्प करके; नीराडिनाल् : स्नान करने से; तींगिन्रि : बिना बाधा के; नाडेल्लाम् : पूरे देश में; तिंगळ् : चंद्र-सम; मुम्मारि : तीन प्रकार की नियमित वर्षा; पेय्दु : बरसे; ओंगु : ऊँची; पेरुंचेन्नेल् : बड़ी धान की फसल; ऊडु : बीच में; कयल् : मछलियाँ; उगळ : उछलती हुई; पूंगुवळै : सुगंधित कमल; पोदिल् : सरोवर / उपवन; पोरिवण्डु : भौंरे; कन : नेत्र; पडुप्प : सोते हुए; तेङ्गादे : बिना थके; पुक्किरुंदु : प्रवेश कर स्थित होकर; सीर् : समृद्ध; मुलै : थन; पैत्र : दूध बहने लगे; पांगय : कमल; नेडुंकण् : लंबी आँखों वाली; सेन्नि : गौर वर्ण; पशुम् : गायें; पेनै : उत्तम; आंगु : उस समय; अप्पोल् : तब; मारैन्दिरुंदु : विनयपूर्वक प्रतीक्षा करते हुए; एम्बावाय् : हे सखियों।
अर्थ (सरल हिन्दी विवरण)
इस पाशुरम् में आंडाल बताती हैं कि यदि हम त्रिविक्रम रूप में तीनों लोकों को नापने वाले परम पुरुष श्रीमन नारायण के नाम का गान करते हुए पावै-व्रत को श्रद्धा से ग्रहण करें और शुद्ध आचरण के साथ स्नान करें, तो उसका प्रभाव केवल आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि समग्र संसार पर भी पड़ता है। तब पूरे देश में बिना किसी बाधा के समय पर भरपूर वर्षा होती है, खेतों में धान लहलहाता है, जलाशयों में जीवन समृद्ध होता है, और प्रकृति आनंद से परिपूर्ण दिखाई देती है। गायें स्वस्थ होकर प्रचुर दूध देती हैं, और समाज में अभाव नहीं रहता। इस प्रकार भगवान की स्तुति और अनुशासित जीवन से लोक-कल्याण, समृद्धि और संतुलन स्वाभाविक रूप से प्रकट होता है—हे सखियों, यही इस व्रत का फल और उद्देश्य है।
महत्वपूर्ण हिंदी भाषा टिप्पणियाँ
ओंगी : ऊँचाई और विस्तार का सूचक शब्द है, जो भगवान के विराट और सर्वव्यापी स्वरूप को व्यक्त करता है; उलागलंद : मात्र भौतिक ‘नापने’ की क्रिया नहीं, बल्कि तीनों लोकों को अपने संरक्षण में समाहित करने का भाव देता है; उत्तमन : नैतिक, आध्यात्मिक और दैवी पूर्णता से युक्त परम पुरुष का द्योतक है; पेर् पाडि : नाम और गान के संयुक्त प्रयोग से भक्ति के सहज मार्ग—नामस्मरण—को केंद्रीय स्थान देता है; चाट्रि : बाहरी घोषणा नहीं, बल्कि आंतरिक संकल्प और नियमबद्ध प्रतिबद्धता को सूचित करता है; तिंगळ् मुम्मारि : संतुलित, समयबद्ध और कल्याणकारी वर्षा का सांस्कृतिक मुहावरा है, न कि अतिवृष्टि; पांगय नेडुंकण् : कमल-उपमा द्वारा सौंदर्य के साथ कोमलता और पवित्रता का संकेत करता है; एम्बावाय् : आदेशात्मक संबोधन नहीं, बल्कि सखियों के बीच आत्मीय आमंत्रण और सामूहिक अनुभूति को प्रकट करता है।
श्रीवैष्णव संप्रदाय व्याख्या
इस पाशुरम् में आंडाल श्रीवैष्णव सिद्धांत के अनुसार यह स्पष्ट करती हैं कि पावै-व्रत का केंद्र स्वयं साधक का प्रयास नहीं, बल्कि भगवान की महिमा का गान है; ओंगी उलागलंद उत्तमन के स्मरण द्वारा यह प्रतिपादित होता है कि वही परम पुरुष—त्रिविक्रम—सर्वलोकों के स्वामी और रक्षक हैं; व्रत, स्नान और अनुशासन जैसे आचरण उपाय नहीं, बल्कि उपेय के अनुकूल आचार हैं; जब जीव अपने कर्तृत्व-अहं को त्याग कर भगवान के नाम में आश्रय लेता है, तब वही कृपा लोक-कल्याण के रूप में प्रकट होती है—वर्षा, समृद्धि, अन्न और गौ-सम्पदा का प्रवाह; यह दर्शाता है कि शरणागति का फल केवल मोक्ष नहीं, बल्कि धर्मयुक्त संसार-व्यवस्था भी है; एम्बावाय् का आत्मीय संबोधन यह संकेत करता है कि यह साधना व्यक्तिगत नहीं, समूहगत भक्ति है, जहाँ सभी जीव भगवान के शेष (अनन्य-शेषत्व) होकर उनकी इच्छा में स्थित रहते हैं।
गद्य रूप में भाव सार
भगवान के महान नाम का स्मरण और स्तुति करते हुए किया गया पावै-व्रत केवल व्यक्तिगत तपस्या नहीं है, बल्कि ऐसा जीवन-अनुशासन है जो समस्त जगत के कल्याण का कारण बनता है। जब जीव त्रिविक्रम स्वरूप परम पुरुष को सर्वस्व मानकर अपने आचरण को शुद्ध करता है, तब भगवान की कृपा से प्रकृति, समाज और जीवन-व्यवस्था में संतुलन प्रकट होता है वर्षा समय पर होती है, अन्न और गौ-सम्पदा समृद्ध होती है, और किसी को अभाव नहीं रहता। इस प्रकार आंडाल यह भाव प्रकट करती हैं कि भगवान की शरण में स्थित भक्ति न केवल मोक्ष का मार्ग है, बल्कि धर्मयुक्त और समरस संसार की भी आधारशिला है हे सखियों, यही पावै-व्रत का अंतरंग रहस्य है।
दैनिक आत्मचिंतन (वैकल्पिक)
आज मैं अपने जीवन में भगवान के नाम-स्मरण और अनुशासित आचरण को कितना स्थान देता हूँ, और क्या मेरे संकल्प तथा दिनचर्या से केवल मेरा नहीं, बल्कि मेरे आसपास के लोगों और परिवेश का भी कल्याण हो रहा है—इस पर मैं ईमानदारी से आत्ममंथन करूँ।
