श्रीमद्भागवतम्
(भक्ति, विचारणा तथा श्रीमन्नारायण केन्द्रित दिव्यज्ञान का प्रवाह)
आवाहन
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयं उदीरयेत् ॥
नारायण, नर, नरोत्तम, देवी सरस्वती तथा व्यास महर्षि को नमस्कार करके “जय” नाम से प्रसिद्ध श्रीमद्भागवतम् का आरम्भ करना चाहिए.
श्रीमद्भागवतम् क्या है
श्रीमद्भागवतम् महापुराणों में अत्यन्त पूजनीय ग्रन्थों में से एक माना जाता है और इसे वैदिक ज्ञान का परिपक्व आध्यात्मिक परमसार समझा जाता है. व्यास महर्षि द्वारा रचित तथा श्रीशुक महर्षि और महाराज परीक्षित के मध्य सम्पन्न पवित्र संवाद के रूप में प्रकट हुआ यह महाग्रन्थ दिव्य कथाओं, तात्त्विक शिक्षाओं, अवतारलीलाओं तथा महाभक्तों के जीवन के माध्यम से श्रीमन्नारायण केन्द्रित परमसत्य को प्रतिपादित करता है.
यह महापुराण केवल दार्शनिक उपदेशों तक सीमित नहीं है. यह भक्ति, विचारणा, वैराग्य, धर्म, सृष्टि रचना, राजधर्म, संन्यास, आध्यात्मिक साधना तथा मोक्ष को एक समग्र आध्यात्मिक दृष्टि के रूप में एकीकृत करता है. बारह स्कन्धों के विस्तृत प्रवाह में श्रीमद्भागवतम् जीव को लोक की अस्थिरता से शाश्वत सत्यस्मरण की ओर क्रमशः ले जाता है.
यह संवाद अत्यन्त महत्वपूर्ण परिस्थिति में प्रकट होता है. जब महाराज परीक्षित अपने भौतिक जीवन के अंतिम चरण के समीप पहुँचते हैं, तब वे मृत्यु, धर्म, स्मरण तथा जीव के लिए परम मंगल क्या है, ऐसे मूल प्रश्न उठाते हैं. श्रीशुक महर्षि द्वारा दिए गए उत्तर ही श्रीमद्भागवतम् के दिव्य प्रवाह के रूप में प्रकट होते हैं.
परम्परा में श्रीमद्भागवतम् को विशेष रूप से कलियुग के लिए मार्गदर्शक दीप माना गया है. विक्षेप, अस्थिरता तथा धर्मक्षीणता से भरे इस युग में श्रवण, भगवत्स्मरण तथा श्रीमन्नारायण के प्रति भक्ति को ही जीव का निश्चित आश्रय यह पवित्र ग्रन्थ बार बार स्थापित करता है.
श्रीमद्भागवतम् का पठन क्यों करना चाहिए
श्रीमद्भागवतम् का अध्ययन केवल बौद्धिक समझ के लिए नहीं किया जाता. इसका अध्ययन पुनः पुनः श्रवण, मनन, चिन्तन तथा भक्ति के माध्यम से अन्तःकरण के परिवर्तन के लिए किया जाता है. यह ग्रन्थ बार बार बताता है कि निष्कपट भागवत श्रवण क्रमशः मन को पवित्र करता है, हृदय को कोमल बनाता है और जीव को शाश्वत सत्य की ओर मोड़ता है.
इसकी कथाओं और शिक्षाओं के माध्यम से पाठक दुःख, अनित्यता, आसक्ति, धर्म, मृत्यु, दैवीकृपा, शरणागति तथा मोक्ष जैसे गम्भीर प्रश्नों का सामना करता है. राजाओं, ऋषियों, भक्तों, देवताओं तथा अवतारों के अनुभव केवल दूरस्थ पुराणकथाएँ नहीं रहते, बल्कि मानवजीवन के प्रत्येक चरण के लिए जीवंत आध्यात्मिक मार्गदर्शन के रूप में प्रकट होते हैं.
श्रीमद्भागवतम् का अध्ययन भक्ति को श्रीमन्नारायण स्मरण केन्द्रित परिवर्तनकारी मार्ग के रूप में और अधिक गहराई से समझने में सहायता करता है. यह ग्रन्थ बार बार प्रकट करता है कि भक्ति जीवन से पृथक नहीं है, बल्कि जीवन को पवित्र करने वाली, मन को स्थिर करने वाली तथा जीव को संसार से परे ले जाने वाली मूल आध्यात्मिक शक्ति है.
इसी कारण सम्प्रदाय में श्रीमद्भागवतम् को ऐसा ग्रन्थ माना गया है जिसका श्रवण, पारायण, मनन तथा जीवनभर पुनः पुनः अध्ययन किया जाना चाहिए. प्रत्येक अध्ययन नयी गहराई, नयी समझ तथा अन्तर्मुख आध्यात्मिक विकास के नये अवसर प्रदान करता है.
श्रीमद्भागवतम् का स्वरूप
श्रीमद्भागवतम् कथा प्रवाह, तात्त्विक गाम्भीर्य, भक्ति अनुभव तथा दैवी तत्त्व की स्पष्टता के माध्यम से एक विस्तृत आध्यात्मिक दृष्टि प्रस्तुत करता है. यह किसी एक रेखीय उपदेश की तरह नहीं, बल्कि परस्पर सम्बद्ध संवादों, पवित्र इतिहासों, ध्यानमय शिक्षाओं तथा दिव्य अनुभूतियों के माध्यम से जीव और श्रीमन्नारायण के सम्बन्ध को क्रमशः प्रकाशित करता है.
बारह स्कन्धों की संरचना इस आध्यात्मिक यात्रा को क्रमशः विकसित करती है. प्रारम्भिक स्कन्ध विचारणा, सृष्टि, धर्म तथा भक्ति की नींव रखते हैं, जबकि आगे के स्कन्ध शरणागति, अवतारलीला, वैराग्य तथा मोक्षतत्त्व को और अधिक गहराई से प्रकट करते हैं. सम्पूर्ण ग्रन्थ प्रवाह में भक्ति ही केन्द्रीय एकीकरण सूत्र के रूप में स्थित रहती है.
यह ऐसा ग्रन्थ नहीं है जिसे शीघ्रता से पढ़कर समाप्त कर दिया जाए, और न ही यह केवल शास्त्रीय अनुसन्धान तक सीमित है. सम्प्रदाय में श्रीमद्भागवतम् को श्रद्धापूर्ण श्रवण, मनन, भक्तिपूर्वक पारायण तथा अन्तर्मुख आध्यात्मिक अनुभूति के माध्यम से ग्रहण किया गया है. इसकी शिक्षाएँ जितनी बार पुनः अनुभव की जाती हैं, उनका आध्यात्मिक गाम्भीर्य उतना ही अधिक श्रोता और पाठक के हृदय में प्रकट होता है.
श्रीमद्भागवत महात्म्य
पवित्र सम्प्रदाय में श्रीमद्भागवत श्रवण, पारायण तथा मनन को अत्यन्त महान महिमा प्रदान की गयी है. इसे केवल एक महापुराण के रूप में नहीं, बल्कि हृदय को पवित्र करने वाले तथा जीव को श्रीमन्नारायण भक्ति की ओर ले जाने वाले जीवंत आध्यात्मिक प्रवाह के रूप में सम्मानित किया जाता है.
श्रीमद्भागवतम् को प्रायः वेदवृक्ष के परिपक्व फल के रूप में वर्णित किया जाता है. श्रीशुक महर्षि के मुख से प्रवाहित उपदेशरस के कारण यह और भी अमृतमय हो गया है, ऐसा सम्प्रदाय बताता है. निष्कपट भागवत श्रवण क्रमशः लोकासक्ति को घटाता है और भगवत्स्मरण को दृढ़ करता है, यह तथ्य भी बार बार प्रतिपादित किया जाता है.
श्रीमद्भागवतम् की महिमा तथा उसके भक्तिपूर्ण श्रवण से उत्पन्न होने वाली आध्यात्मिक परिवर्तनशक्ति का गान करने वाले अनेक श्लोक सम्प्रदाय में प्रसिद्ध हैं.
वेदवृक्ष का परिपक्व फल
निगम कल्पतरोर्गलितं फलम्
शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम् ।
पिबत भागवतं रसमालयं
मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः ॥
“वेदरूपी कल्पवृक्ष का परिपक्व फल श्रीमद्भागवतम्, श्रीशुक महर्षि के मुखामृत से और भी मधुर हो गया है. हे रसिकों, हे भावुकों, इस दिव्यरस का पुनः पुनः आस्वादन करो.”
श्रवण की पवित्रता
शृण्वतां स्वकथाः कृष्णः
पुण्यश्रवणकीर्तनः ।
हृद्यन्तःस्थो ह्यभद्राणि
विधुनोति सुहृत्सताम् ॥
“जो लोग भक्तिपूर्वक भगवान् की दिव्य कथाओं का श्रवण और कीर्तन करते हैं, उनके हृदय में स्थित श्रीकृष्ण उनकी आन्तरिक अशुद्धियों को दूर कर देते हैं.”
इस प्रकार भागवत महात्म्य कलियुग में भागवत श्रवण, पारायण, मनन तथा संरक्षण को जीव के लिए उपलब्ध सर्वोच्च आध्यात्मिक सम्पदाओं में स्थापित करता है.
श्रीमद्भागवतम् के पाँच पठन मार्ग
इस पवित्र ग्रन्थ का अनुभव अनेक परस्परपूरक प्रवाहों के माध्यम से किया जा सकता है. प्रत्येक प्रवाह अध्ययन, श्रवण, मनन तथा भक्ति आधारित अन्तर्मुख अनुभूति के द्वारा श्रीमद्भागवतम् के एक विशेष पक्ष को प्रकाशित करता है.
पारायणम्
श्रवण, जपप्रवाह तथा श्लोकध्वनि की दिव्य अनुभूति केन्द्रित भक्तिपूर्ण पारायण और श्रवण प्रवाह.
अध्ययनम्
श्लोकपाठ, पदविच्छेद, पद पदार्थ, स्तरानुसार समझ तथा ग्रन्थ अध्ययन पर केन्द्रित संरचित अध्ययन प्रवाह.
भावार्थम्
ग्रन्थ के भावप्रवाह, भक्ति, कथात्मक सम्बन्ध तथा तात्त्विक सार को सरल प्रवाहमयी गद्यरूप में प्रस्तुत करने वाला अनुभूति प्रवाह.
सारांशम्
श्रीमद्भागवतम् के कथानुक्रम, तात्त्विक दिशा तथा स्कन्ध अध्याय सम्बन्ध को संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत करने वाला संरचनात्मक अवलोकन प्रवाह.
सारम्
प्रत्येक अध्याय तथा स्कन्ध के अन्तर्मर्म, आत्मपरिवर्तन, धार्मिक आचरण तथा मोक्षदिशा को प्रकट करने वाला आध्यात्मिक सार प्रवाह.
ये सभी प्रवाह एक ही पवित्र ग्रन्थ को भिन्न अनुभव मार्गों से प्रकाशित करते हैं, किन्तु सभी एक ही भक्ति और दैवी तत्त्व की आधारभूमि पर स्थित हैं.
स्कन्ध संरचना
श्रीमद्भागवतम् बारह स्कन्धों में विस्तृत होकर जीव की आध्यात्मिक यात्रा के विविध चरणों को प्रस्तुत करता है. ये स्कन्ध समष्टिरूप से जीव को विचारणा और लोक अस्थिरता से भक्ति, शरणागति, स्मरण तथा श्रीमन्नारायण केन्द्रित मोक्षस्वरूप समझ की ओर क्रमशः ले जाते हैं.
प्रत्येक स्कन्ध अपनी विशिष्ट कथाओं, शिक्षाओं तथा तात्त्विक महत्व को धारण करता है, किन्तु ये बारह स्कन्ध मिलकर भक्ति, धर्म तथा आत्मा के शाश्वत स्वरूप की समझ को क्रमशः गहरा करने वाले निरन्तर आध्यात्मिक प्रवाह के रूप में स्थित होते हैं.
स्कन्ध ०१ | नैमिषारण्य में विचारणा और भक्ति की आधारभूमि
(धर्मक्षीणता के मध्य ऋषियों द्वारा परमश्रेय की खोज तथा भक्तिमार्ग की स्थापना)
प्रथम स्कन्ध नैमिषारण्य के ऋषियों की विचारणा, श्रीकृष्ण की प्रत्यक्ष अवतारलीला समापन तथा कलियुग के आरम्भ के आधार पर श्रीमद्भागवतम् की आध्यात्मिक नींव स्थापित करता है. महाराज परीक्षित का जीवन भागवत श्रवण की आवश्यकता को प्रकट करने वाले केन्द्रीय सूत्र के रूप में स्थित होता है. यह स्कन्ध क्रमशः श्रोता को बताता है कि लोक अस्थिरता के मध्य भक्ति ही परम आश्रय है.
स्कन्ध ०२ | परमसत्य का दर्शन
(विराट्स्वरूप तथा ध्यानाराधना के माध्यम से परमात्मतत्त्व का प्रकाश)
द्वितीय स्कन्ध भगवान् के विश्वरूप, ध्यानाराधना, सृष्टि रचना तथा स्मरण ध्यान के सिद्धान्तों को प्रस्तुत करता है. श्रीशुक महर्षि और महाराज परीक्षित के संवाद के माध्यम से श्रोता बाह्य दृष्टि से समस्त सृष्टि के आधारभूत परमसत्य के दर्शन की ओर क्रमशः अग्रसर होता है. यह स्कन्ध भक्ति और ध्यान को भय तथा अनित्यता से पार जाने वाले मार्ग के रूप में स्थापित करता है.
स्कन्ध ०३ | सृष्टि और कपिल महर्षि का उपदेश
(विदुर, मैत्रेय महर्षि तथा कपिल भगवान् के माध्यम से सृष्टि और भक्ति तत्त्व का विवेचन)
तृतीय स्कन्ध सृष्टि, विश्वविस्तार तथा भगवान् के अवतरण को विदुर, मैत्रेय महर्षि तथा कपिल भगवान् के गम्भीर संवादों के माध्यम से प्रस्तुत करता है. विस्तृत सृष्टिवर्णन के साथ साथ आत्मस्वरूप, भौतिक जीवन, भक्ति तथा मोक्ष पर गहन आध्यात्मिक शिक्षाएँ भी इसमें प्रकट होती हैं. कपिल और देवहूति का संवाद श्रीमद्भागवतम् में भक्ति तथा सांख्य तत्त्व की आधारभूत व्याख्या के रूप में प्रतिष्ठित है.
स्कन्ध ०४ | धर्म और अहंकार का परिवर्तन
(दक्षयज्ञ, ध्रुव तथा राजवंशों के माध्यम से स्थिरभक्ति की परीक्षा)
चतुर्थ स्कन्ध अहंकार, भक्ति, राजधर्म, यज्ञ तथा आध्यात्मिक परिवर्तन से सम्बन्धित अत्यन्त प्रभावशाली कथाओं को प्रस्तुत करता है. दक्षयज्ञ, सतीदेवी, ध्रुव महाराज तथा पृथु महाराज की कथाओं के माध्यम से यह स्कन्ध बार बार दिखाता है कि गर्व, आसक्ति तथा लौकिक इच्छाएँ भगवद्भक्ति के द्वारा कैसे पवित्र हो सकती हैं. यह भी प्रकट किया जाता है कि स्थिर भक्ति लौकिक आसक्ति को ही आध्यात्मिक उन्नति का साधन बना सकती है.
स्कन्ध ०५ | वैराग्य और विश्वरचना
(ऋषभदेव, भरत तथा विश्वव्यवस्था के माध्यम से वैराग्यमार्ग का निर्देशन)
पञ्चम स्कन्ध वैराग्य की शिक्षाओं को विश्वरचना के वर्णनों के साथ समन्वित करता है. ऋषभदेव के जीवन तथा भरत महाराज की आध्यात्मिक यात्रा के माध्यम से यह स्कन्ध आसक्ति के सूक्ष्म संकटों तथा साधक के लिए अन्तर्मुख सजगता की आवश्यकता को प्रकट करता है. विश्वरचना के वर्णन मानवजीवन को कर्म तथा धर्म द्वारा संचालित दैवी व्यवस्था के भीतर स्थापित करते हैं.
स्कन्ध ०६ | दैवी नाम की महिमा और कृपासूत्र
(अजामिल की कथा के माध्यम से नामस्मरण और मोक्ष की महिमा)
षष्ठ स्कन्ध भगवन्नाम की महिमा, दैवी कृपा, पश्चात्ताप तथा आध्यात्मिक विमोचन को अत्यन्त बलपूर्वक प्रस्तुत करता है. अजामिल की कथा के माध्यम से श्रीमद्भागवतम् यह प्रकट करता है कि अपूर्ण भगवत्स्मरण भी मोक्ष का कारण बन सकता है. यह स्कन्ध बार बार स्थापित करता है कि श्रीमन्नारायण की करुणा सामान्य लौकिक न्याय से परे है और सच्ची शरणागति के माध्यम से मुक्ति का मार्ग खोलती है.
स्कन्ध ०७ | अचल भक्ति का वैभव
(प्रह्लाद तथा नरसिंह अवतार के माध्यम से परमभक्ति का प्रकाश)
सप्तम स्कन्ध प्रह्लाद महाराज के जीवन तथा नरसिंह भगवान् के अवतार के माध्यम से अचल भक्ति के सर्वोच्च स्वरूप को प्रस्तुत करता है. विरोध, भय तथा अत्याचार के मध्य भी प्रह्लाद की भक्ति का अडिग बने रहना भगवान् के प्रति सच्ची शरणागति की अजेयता को प्रकट करता है. यह स्कन्ध भक्ति के आधार पर धर्म, सामाजिक व्यवस्था, गृहस्थ जीवन तथा आध्यात्मिक साधना का भी विवेचन करता है.
स्कन्ध ०८ | शरणागति और दैवी आश्रय
(गजेन्द्रमोक्ष, समुद्रमन्थन तथा वामनावतार के माध्यम से शरणागति की स्थापना)
अष्टम स्कन्ध बार बार यह बताता है कि सच्ची शरणागति करने वालों के लिए भगवान् ही परम आश्रय हैं. गजेन्द्रमोक्ष, समुद्रमन्थन तथा वामनावतार जैसी कथाओं के माध्यम से यह स्कन्ध भक्तों पर भगवान् की रक्षा, करुणा तथा दैवी हस्तक्षेप को प्रकट करता है. शरणागति को जीव को संकट और मोह से बाहर ले जाने वाले केन्द्रीय आध्यात्मिक सिद्धान्त के रूप में स्थापित किया गया है.
स्कन्ध ०९ | राजवंश और धर्मप्रवाह
(इक्ष्वाकु तथा चन्द्रवंशों के माध्यम से धर्मपरम्परा की निरन्तरता)
नवम स्कन्ध सूर्यवंश तथा चन्द्रवंश में उत्पन्न महाराजाओं, ऋषियों तथा भक्तों की वंशपरम्परा को प्रस्तुत करता है. इन वंशकथाओं के माध्यम से यह स्कन्ध दिखाता है कि धर्म पीढ़ी दर पीढ़ी कैसे संरक्षित, परीक्षित, क्षीण तथा पुनर्स्थापित होता है. यह अगले स्कन्ध में श्रीकृष्णावतार के प्रवेश की आधारभूमि भी तैयार करता है.
स्कन्ध १० | श्रीकृष्णलीला की पूर्णता
(श्रीकृष्णावतार के माध्यम से दैवीलीला तथा भक्ति का पूर्ण प्रकाश)
दशम स्कन्ध श्रीमद्भागवतम् का हृदय माना जाता है और श्रीकृष्ण की पूर्ण दिव्य अवतारलीला को प्रस्तुत करता है. जन्म, बाल्यलीला, उपदेश, भक्तरक्षा तथा अधर्म विनाश तक भगवान् यहाँ अत्यन्त सन्निकट, मधुर तथा सहज उपलब्ध स्वरूप में प्रकट होते हैं. इस स्कन्ध में भक्ति आदरभाव से प्रेम, स्मरण तथा पूर्ण भगवदेकाग्रता की ओर परिपक्व होती है.
स्कन्ध ११ | वैराग्य और अंतिम उपदेश
(उद्धवगीता के माध्यम से भक्ति, ज्ञान तथा वैराग्य का समन्वय)
एकादश स्कन्ध श्रीकृष्ण की प्रत्यक्ष अवतारलीला समापन से पूर्व उद्धव को प्रदान किए गए गम्भीर अंतिम उपदेशों को प्रस्तुत करता है. उद्धवगीता तथा सम्बन्धित शिक्षाओं के माध्यम से यह स्कन्ध भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, ध्यान तथा आध्यात्मिक साधना को एक समग्र मोक्षमार्ग के रूप में समन्वित करता है. यह बार बार कालगति के अनिवार्य परिवर्तनों के मध्य लोकमोह से वैराग्य तथा भगवत्स्मरण की स्थिरता को दृढ़ करता है.
स्कन्ध १२ | कालगति और समापन दृष्टि
(कलियुग प्रवाह तथा परमसत्य की अंतिम स्थापना)
द्वादश स्कन्ध कलियुग से सम्बन्धित क्रमिक पतन, लोक की अस्थिरता तथा भौतिक संरचनाओं की अनित्यता का वर्णन करता है. साथ ही यह भगवत्स्मरण तथा श्रीमद्भागवत श्रवण के माध्यम से प्राप्त होने वाले शाश्वत आध्यात्मिक आश्रय को पुनः स्थापित करता है. जब महापुराण अपने समापन की ओर अग्रसर होता है, तब यह स्कन्ध श्रोता को कालभय से दूर कर श्रीमन्नारायण केन्द्रित परमसत्य की ओर दृष्टि करने के लिए प्रेरित करता है.
इस प्रकार श्रीमद्भागवतम् के बारह स्कन्ध विचारणा से आरम्भ होकर वैराग्य, स्मरण तथा श्रीमन्नारायण के परमसत्य अनुभव में सम्पन्न होने वाले क्रमबद्ध आध्यात्मिक प्रवाह के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं. कथा, तत्त्व, भक्ति तथा मनन के माध्यम से जीव को लोकासक्ति से आध्यात्मिक जागरण और मोक्ष की ओर क्रमशः ले जाया जाता है.
अपने पठन का आरम्भ
श्रीमद्भागवत अनुभव सम्प्रदाय में श्रद्धापूर्ण श्रवण, मनन, चिन्तन, पारायण तथा पुनः पुनः गम्भीर अध्ययन के माध्यम से विकसित होता है. विभिन्न अध्ययन विधियाँ एक ही दिव्य उद्घाटन के विविध पक्षों को प्रकाशित करती हैं और सभी का केन्द्र श्रीमन्नारायण भक्ति ही है.
इसी कारण यहाँ श्रीमद्भागवतम् को पाँच परस्परपूरक प्रवाहों के रूप में प्रस्तुत किया गया है. प्रत्येक प्रवाह अध्ययन, श्रवण, समझ, मनन तथा अन्तर्मुख आध्यात्मिक विकास की एक विशिष्ट पद्धति को सहारा देने के लिए निर्मित किया गया है.
आप श्रीमद्भागवत के पवित्र प्रवाह में जिस प्रकार के अध्ययन, श्रवण, मनन या भक्तिमार्ग के माध्यम से प्रवेश करना चाहते हैं, उसके अनुसार किसी भी प्रवाह से आरम्भ कर सकते हैं.
श्रीमद्भागवतम्|पारायणम्
श्रीमद्भागवतम्|अध्ययनम्
श्रीमद्भागवतम्|भावार्थम्
श्रीमद्भागवतम्|सारांशम्
श्रीमद्भागवतम्|सारम्
ये सभी प्रवाह मिलकर जीव को श्रीमद्भागवतम् की भक्ति, तत्त्व, मनन तथा आत्मपरिवर्तनमयी धारा में क्रमशः प्रवेश कराने के लिए निर्मित किए गए हैं.
समापन चिन्तन
श्रीमद्भागवतम् केवल प्राचीन कथाओं या दार्शनिक शिक्षाओं का संग्रह नहीं है. यह श्रीमन्नारायण की कृपा के माध्यम से जीव को स्मरण, शरणागति, भक्ति तथा अन्तर्मुख आध्यात्मिक परिवर्तन की ओर निरन्तर आमन्त्रित करने वाला जीवंत आध्यात्मिक प्रवाह है.
अध्ययन, पारायण, मनन तथा चिन्तन के माध्यम से जीव क्रमशः विचारणा से भक्ति की ओर, अस्थिरता से स्थिरता की ओर तथा लोकासक्ति से भगवत्स्मरण की ओर अग्रसर होता है.
“भक्तिपूर्वक श्रवण किया गया प्रत्येक श्लोक जीव को श्रीमन्नारायण के और अधिक समीप ले जाता है”
