पुराणम्
संस्कृत साहित्य में पुराण एक महान ग्रंथ परम्परा के रूप में स्थापित हैं, जो भक्ति, सृष्टि, लीला, धर्मबोध और तत्त्वविचार को समग्र रूप से व्यक्त करती है। वेद के अर्थ को कथा रूप में विस्तार करते हुए, सामान्य भक्त के लिए भी सरल रूप में परमात्मा का स्वरूप, अवतार लीलाएँ और भक्ति मार्ग को प्रस्तुत करना पुराणों की विशेषता है।
पुराण परम्परा में भगवान की महिमा, उनका अनुग्रह स्वभाव, जीवात्मा की स्थिति और धर्म के आचरण का महत्व विस्तार से वर्णित किया जाता है। ये ग्रंथ केवल कथाएँ नहीं हैं, बल्कि आचरण की दिशा देने वाले शास्त्रसार के रूप में प्रकट होते हैं। इस प्रकार अध्ययन, पारायण और नित्य स्मरण के लिए पुराण एक महत्वपूर्ण आधार बनते हैं।
इस विभाग में पुराण ग्रंथों को परम्परा के अनुरूप, अध्ययन और पारायण के लिए उपयुक्त रूप में क्रमबद्ध प्रस्तुत किया जाएगा। प्रारम्भिक चरण में श्रीमद्भागवतम् जैसे प्रमुख पुराणों को प्राथमिकता दी जाएगी। इसके पश्चात अन्य पुराण भी इसी क्रम में जोड़े जाएंगे।
वर्तमान में इस विभाग में केवल शीर्षक ही संकेत रूप में दिए गए हैं। जब संबंधित पुराण ग्रंथ प्रारम्भ होंगे, तब उनकी सामग्री परम्परा के अनुसार क्रमशः जोड़ी जाएगी।
