श्रीमद्भागवतम्

अध्ययनम् | स्कन्ध ०१

(नैमिषारण्य की विचारणा, कलियुग के प्रारम्भ की अस्थिरता तथा भक्ति मार्ग की आधारभूमि)

श्रीमद्भागवतम् का प्रथम स्कन्ध इस महापुराण के सम्पूर्ण प्रवाह में प्रवेश करने के लिए अध्ययनम् पठन मार्ग का द्वार बनकर प्रकट होता है. नैमिषारण्य में महर्षियों द्वारा प्रस्तुत प्रश्न केवल शास्त्रीय विचारणा नहीं हैं; वे कलियुग में जीव शाश्वत श्रेय कैसे प्राप्त करे, इस अत्यावश्यक अन्वेषण के रूप में प्रकट होते हैं. इस स्कन्ध के माध्यम से अध्ययनम्, प्रश्न और विचारणा से आरम्भ होने वाली आध्यात्मिक यात्रा का स्वरूप ग्रहण करता है.

इस स्कन्ध में धर्म की क्षीणता, श्रीकृष्ण की प्रत्यक्ष अवतारलीला समापन के पश्चात उत्पन्न हुई आन्तरिक शून्यता, कलियुग का प्रभाव तथा मानवजीवन की अस्थिरता क्रमशः प्रकट होती है. इस पृष्ठभूमि में घटित प्रत्येक घटना इस प्रश्न की आधारभूमि निर्मित करती है कि श्रीमद्भागवतम् का श्रवणम् और अध्ययनम् क्यों किया जाना चाहिए.

महाराज परीक्षित के प्रवेश के साथ यह स्कन्ध और अधिक व्यक्तिगत तथा अन्तर्मुख दिशा ग्रहण करता है. मृत्यु का प्रत्यक्ष सामना कर रहे राजा और उन्हें उपदेश देने के लिए प्रकट हुए श्रीशुकदेव गोस्वामी के मध्य घटित पवित्र संवाद अध्ययनम् को केवल बौद्धिक परीक्षण तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे जीवन और परमगति के साथ प्रत्यक्ष रूप से जोड़ देता है.

अध्ययनम् की दृष्टि से यह स्कन्ध अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यहीं श्रीमद्भागवतम् के मुख्य प्रश्न, श्रवणम् परम्परा, गुरु शिष्य परम्परा, भक्ति की दिशा तथा तात्त्विक प्रवाह प्रथम बार क्रमबद्ध रूप में प्रकट होते हैं. आगे के स्कन्धों में विस्तृत होने वाली अनेक शिक्षाओं और लीलाओं की आधारभूमि भी यही स्कन्ध बनता है.

इस स्कन्ध के प्रत्येक अध्याय को श्लोकपाठम्, श्रवणम्, पदविच्छेदम्, पद – पदार्थम् तथा यथातथ हिन्दी अनुवादम् के साथ क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत किया जाएगा. इसके माध्यम से पाठक केवल कथा प्रवाह ही नहीं, बल्कि श्लोकों की संरचना तथा भक्ति तात्त्विक दिशा को भी क्रमशः समझने में समर्थ हो सकेगा.

अध्ययनम् | स्कन्ध ०१ | अध्याय सूची

स्कन्ध ०१ | अध्याय ०१
स्कन्ध ०१ | अध्याय ०२
स्कन्ध ०१ | अध्याय ०३
स्कन्ध ०१ | अध्याय ०४
स्कन्ध ०१ | अध्याय ०५
स्कन्ध ०१ | अध्याय ०६
स्कन्ध ०१ | अध्याय ०७
स्कन्ध ०१ | अध्याय ०८
स्कन्ध ०१ | अध्याय ०९
स्कन्ध ०१ | अध्याय १०
स्कन्ध ०१ | अध्याय ११
स्कन्ध ०१ | अध्याय १२
स्कन्ध ०१ | अध्याय १३
स्कन्ध ०१ | अध्याय १४
स्कन्ध ०१ | अध्याय १५
स्कन्ध ०१ | अध्याय १६
स्कन्ध ०१ | अध्याय १७
स्कन्ध ०१ | अध्याय १८
स्कन्ध ०१ | अध्याय १९
स्कन्ध ०१ | अध्याय २०
स्कन्ध ०१ | अध्याय २१
स्कन्ध ०१ | अध्याय २२
स्कन्ध ०१ | अध्याय २३

“जब विचारणा श्रद्धा के साथ जुड़ती है, तब अध्ययनम् क्रमशः भक्ति मार्ग में परिवर्तित होने लगता है”

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