श्रीमद्भागवतम्

सारांश | स्कन्ध ०१

(नैमिषारण्य की विचारणा, कलियुग के प्रारम्भ की अस्थिरता तथा भक्ति तत्त्व की आधारभूमि)

श्रीमद्भागवतम् का प्रथम स्कन्ध उस काल से आरम्भ होता है जब श्रीकृष्ण अपनी प्रत्यक्ष भौतिक लीलाओं का समापन कर पृथ्वी से अन्तर्धान हो चुके होते हैं. उनके प्रत्यक्ष सान्निध्य के अप्रकट होते ही कलियुग का प्रभाव धीरे धीरे सम्पूर्ण जगत में फैलना प्रारम्भ हो जाता है. विवेक दुर्बल होने लगता है, मर्यादाएँ शिथिल पड़ने लगती हैं, और दैवी उपस्थिति से स्थिर बनी हुई जीवन की समता डगमगाने लगती है. युग स्वयं एक आन्तरिक अशान्ति का अनुभव करने लगता है. किन्तु इसी अनिश्चित वातावरण में श्रीमद्भागवतम् अपना मूल आश्वासन स्थापित करता है: जब भगवान प्रत्यक्ष नेत्रगोचर नहीं रहते, तब उनका स्मरण तथा पवित्र कथाश्रवण ही धर्म को स्थिर रखने वाला मार्ग बन जाता है.

नैमिषारण्य में दीर्घसत्रयज्ञ में संलग्न ऋषिगण इस अशान्त युग के लिए शाश्वत मंगलमार्ग की खोज करते हुए सूत महर्षि से प्रश्न करते हैं. उनकी विचारणा केवल जिज्ञासा से प्रेरित नहीं है; वह उस युग की चिन्ता से उत्पन्न होती है जिसमें मनुष्यों की आयु घट रही है, शक्ति क्षीण हो रही है, और धर्मनिष्ठा दुर्बल होती जा रही है. वे जानना चाहते हैं कि ऐसा कौन सा उपदेश है जो कलियुग की बढ़ती हुई विक्षुब्धता के मध्य ज्ञान, भक्ति तथा धर्मस्मरण को सुरक्षित रख सके. इन्हीं प्रश्नों के माध्यम से कथा प्रवाह श्रीमद्भागवतम् की ओर मुड़ता है और यह महाग्रन्थ कलियुग में भी श्रीमन्नारायण स्मरण को स्थिर रखने वाले परम आध्यात्मिक आश्रय के रूप में प्रतिष्ठित होता है.

इसके पश्चात कथा व्यास महर्षि की ओर अग्रसर होती है. वेदों का विभाजन करने तथा अनेक पवित्र ग्रन्थों की रचना करने के उपरान्त भी उनके हृदय में एक प्रकार की अपूर्णता बनी रहती है. उसी समय नारद महर्षि प्रकट होकर उसके कारण को स्पष्ट करते हैं: भगवान के प्रति अनन्य भक्ति में समाप्त न होने वाला ज्ञान हृदय को पूर्ण सन्तोष प्रदान नहीं कर सकता. उस उपदेश के प्रभाव से व्यास महर्षि अपने मन को पूर्णतः श्रीमन्नारायण की महिमा तथा भक्ति मार्ग पर केन्द्रित करते हैं. इस प्रकार श्रीमद्भागवतम् केवल एक अन्य ग्रन्थ के रूप में नहीं, बल्कि कलियुग के लिए मार्गदर्शक पवित्र भक्ति प्रवाह के रूप में प्रकट होता है.

इस स्कन्ध में महाराज परीक्षित का भी परिचय होता है. उनका जीवन श्रीकृष्ण की भौतिक लीलाओं और कलियुग के आरम्भ के मध्य सेतु के समान प्रकट होता है. गर्भावस्था में ही श्रीकृष्ण द्वारा रक्षित हुए परीक्षित आगे चलकर धर्मनिष्ठ भाव से राज्य का संचालन करते हैं. कलि के साथ उनका संवाद युगस्वरूप को स्पष्ट कर देता है: धर्म अभी विद्यमान है, किन्तु अब उसकी सावधानीपूर्वक रक्षा करना आवश्यक हो गया है. परीक्षित के शासन के माध्यम से श्रीमद्भागवतम् यह प्रकट करता है कि भक्ति द्वारा निर्देशित राजधर्म कलियुग के प्रारम्भ में भी शान्ति और व्यवस्था को सुरक्षित रख सकता है.

अन्ततः ऋषिपुत्र के शाप के कारण समीप आती मृत्यु को परीक्षित शान्त भाव से स्वीकार कर अपने राज्य का परित्याग कर देते हैं. गङ्गातट पर महर्षियों के एकत्र होने पर वे एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रश्न प्रस्तुत करते हैं: मृत्यु समीप आने पर जीव को क्या सुनना चाहिए, क्या स्मरण करना चाहिए, और क्या आचरण करना चाहिए? ठीक उसी समय श्रीशुक महर्षि वहाँ पधारते हैं. इस प्रकार श्रीमद्भागवतम् में प्रवाहित होने वाले महान संवाद की भूमिका पूर्ण होती है. कलियुग की अशान्ति अन्ततः भगवत्स्मरण को सुरक्षित रखने वाले दिव्य कथाप्रवाह का कारण बनती है.

इस प्रकार प्रथम स्कन्ध यह प्रकट करता है कि जब भगवान प्रत्यक्ष दर्शन से अप्रकट हो जाते हैं और युग अनिश्चितता से भर जाता है, तब पवित्र कथाश्रवण ही भक्ति की रक्षा करके मानवता को श्रीमन्नारायण स्मरण की ओर अग्रसर करता है.

“विचारणा से आरम्भ हुआ प्रवाह क्रमशः भक्ति और श्रवण मार्ग के रूप में विस्तृत होने लगता है”

स्कन्ध ०१ | अध्याय ०१

नैमिषारण्य में ऋषियों की विचारणा

(शौनक महर्षि के नेतृत्व वाले ऋषियों द्वारा कलियुग में धर्म को स्थिर रखने वाले उपदेश को जानने के लिए सूत महर्षि से प्रश्न करना)

जब कलियुग धीरे धीरे अपना प्रभाव फैलाना प्रारम्भ कर रहा था, तब शौनक महर्षि के नेतृत्व में ऋषिगण नैमिषारण्य के पवित्र वन में एकत्रित होते हैं. उनका यह समागम संसार से दूर जाने का प्रयास नहीं था. वह धर्म को उसके क्षय के प्रारम्भ में ही सुरक्षित रखने का संकल्पपूर्ण प्रयत्न था. वे समझते हैं कि जब भगवान का प्रत्यक्ष सान्निध्य अप्रकट हो जाता है, तब आध्यात्मिक स्पष्टता दुर्बल होने लगती है. इसलिए वे उस मार्ग की खोज आरम्भ करते हैं जो समस्त जीवों के लिए शाश्वत मंगल को स्थिर रख सके.

ऋषिगण विनयपूर्वक सूत महर्षि के समीप जाकर प्रश्न करते हैं कि मानवजीवन का परम कर्तव्य क्या है. प्रत्येक युग में और प्रत्येक परिस्थिति में जीव को वास्तविक मंगल प्रदान करने वाला तत्त्व क्या है, इसी को जानने की उत्कण्ठा उनकी विचारणा का मूल बनती है. उनके प्रश्नों में व्यक्तिगत इच्छाएँ, कर्मकाण्डीय गणनाएँ या पाण्डित्य प्रदर्शन नहीं दिखाई देता. उस विनम्र अवस्था में विचारणा स्वयं पवित्र स्वरूप धारण कर लेती है. वह कल्पना से नहीं, बल्कि समर्पणभाव से अपनी गम्भीरता प्राप्त करती है.

सूत महर्षि परम्परा की प्रामाणिकता का स्मरण कराते हुए यह स्थिर करते हैं कि श्रीमन्नारायण के प्रति प्रेमपूर्ण भक्तिसेवा ही जीवन का परम पुरुषार्थ है. वे बताते हैं कि अन्य सभी मार्ग, चाहे वे कितने ही श्रेष्ठ क्यों न प्रतीत हों, अन्ततः भगवान की ओर ले जाने वाली भक्ति में ही पूर्णता प्राप्त करते हैं. इस संवाद के माध्यम से श्रीमद्भागवतम् विनय, श्रवण और स्मरण पर आधारित दिव्य संवाद के रूप में अपना स्वरूप स्थापित करता है.

इस प्रकार प्रथम अध्याय उस सत्य को प्रकट करता है जो सम्पूर्ण श्रीमद्भागवतम् की आधारशिला बनता है. वास्तविक विचारणा केवल जिज्ञासा से आरम्भ नहीं होती. वह परमात्मा की अविच्छिन्न सेवा करने की तड़प से आरम्भ होती है.

“केवल वही विचारणा वास्तविक है जो श्रीमन्नारायण की सेवा की खोज करती है.”

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