श्रीमद्भागवतम् | अध्ययन

स्कन्ध ०१ | अध्याय ०२

भगवद्भक्ति तत्त्व निरूपण

(धर्म के सार के रूप में भगवद्भक्ति का स्वरूप और परम मार्ग का निरूपण)

सूत महर्षि ऋषियों के गहन प्रश्नों का उत्तर देते हुए मानव जीवन का वास्तविक कल्याण क्या है, इसे स्पष्ट रूप से स्थापित करते हैं. अनेक मार्ग और अनेक प्रकार के धर्माचरण होते हुए भी, उन सबको पार कर जो स्थिर रहता है, उस प्रश्न का उत्तर देते हुए वे भगवद्भक्ति को परम सार के रूप में स्थापित करते हैं. यह अध्याय प्रकट करता है कि जीवन का लक्ष्य केवल कर्मों की वृद्धि नहीं है, बल्कि भगवान के प्रति निर्मल भक्ति के द्वारा ही पूर्णता प्राप्त होती है.

सूत महर्षि समस्त धर्मों के सार को विखंडित रूप में नहीं, बल्कि समग्र दृष्टि से समझाते हुए भक्ति के लक्षणों, उसके फल और वह मन को किस प्रकार शुद्ध करती है, इसका वर्णन करते हैं. वे दिखाते हैं कि भक्ति के द्वारा अज्ञान दूर होता है और ज्ञान तथा वैराग्य स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होते हैं. श्रीमन्नारायण के कीर्तन, स्मरण और सेवा के द्वारा हृदय शुद्ध होकर जीव अपने वास्तविक स्वरूप को जान सकता है. इस तथ्य को यह अध्याय दृढ़ता से स्थापित करता है.

इस प्रकार यह अध्याय केवल एक दार्शनिक विवेचन बनकर नहीं रहता, बल्कि आचरण के योग्य एक मार्ग भी प्रस्तुत करता है. श्रवण, कीर्तन और स्मरण के माध्यम से भगवान की उपस्थिति का अनुभव करने का मार्ग ही कलियुग में सरल और श्रेष्ठ माना गया है. इस प्रकार यह अध्याय स्पष्ट रूप से सिद्ध करता है कि भगवद्भक्ति ही जीवन के समस्त प्रश्नों का उत्तर देने वाला परम मार्ग है.

श्लोकपाठ

(व्यास उवाच)
इति सम्प्रश्नसंहृष्टो विप्राणां रौमहर्षणिः ।
प्रतिपूज्य वचस्तेषां प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥
॥ ०१.०२.०१ ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

(व्यासः उवाच)
इति सम्प्रश्न संहृष्टः विप्राणां रोमहर्षणिः ।
प्रतिपूज्य वचः तेषां प्रवक्तुम् उपचक्रमे ॥

पद - पदार्थ

व्यासः : व्यास महर्षि; उवाच : बोले; इति : इस प्रकार; सम्प्रश्न संहृष्टः : सम्यक् प्रश्न किए जाने से प्रसन्न हुए; विप्राणां : ब्राह्मणों के; रोमहर्षणिः : रोमहर्षण के पुत्र सूत; प्रतिपूज्य : आदर करके; वचः : वचन; तेषां : उनके; प्रवक्तुम् : कहने के लिए; उपचक्रमे : प्रारम्भ किया

यथातथ अनुवाद

(व्यास महर्षि बोले) इस प्रकार, ब्राह्मणों के प्रश्नों से प्रसन्न हुए रोमहर्षण के पुत्र सूत ने उनके वचनों का आदर करके उन्हें कहने के लिए प्रारम्भ किया.

सरल भाव

व्यास महर्षि के कथनानुसार, ऋषियों द्वारा श्रद्धा से पूछे गए प्रश्नों से प्रसन्न होकर सूत ने उनके आदर को स्वीकार करते हुए उन्हें उत्तर देना आरम्भ किया.

श्लोकपाठ

(सूत उवाच)
यं प्रव्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यं
द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव ।
पुत्रेति तन्मयतया तरवोऽभिनेदुः
तं सर्वभूतहृदयं मुनिमानतोऽस्मि ॥
॥ ०१.०२.०२ ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

(सूतः उवाच)
यम् प्रव्रजन्तम् अनुपेतम् अपेत कृत्यम्
द्वैपायनः विरह कातरः आजुहाव ।
पुत्र इति तन्मयतया तरवः अभिनेदुः
तम् सर्वभूत हृदयम् मुनिम् आनतः अस्मि ॥

पद - पदार्थ

सूतः : सूत; उवाच : कहा; यम् : उस महर्षि को; प्रव्रजन्तम् : संन्यास के लिए जाते हुए; अनुपेतम् : उपनयन संस्कार के बिना; अपेत कृत्यम् : कर्तव्यों को त्यागकर; द्वैपायनः : द्वैपायन (व्यास महर्षि); विरह कातरः : विरह से व्याकुल; आजुहाव : पुकारा; पुत्र इति : “हे पुत्र” इस प्रकार; तन्मयतया : उसी में लीन भाव से; तरवः : वृक्षों ने; अभिनेदुः : प्रतिध्वनित किया; तम् : उस मुनि को; सर्वभूत हृदयम् : समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित; मुनिम् : मुनि को; आनतः अस्मि : मैं नमस्कार करता हूँ

यथातथ अनुवाद

(सूत महर्षि बोले) उपनयन संस्कार के बिना ही, कर्तव्यों को त्यागकर संन्यास के लिए जाते हुए उस महर्षि को, विरह से व्याकुल द्वैपायन ने “हे पुत्र” कहकर पुकारा. उसी में लीन भाव से वृक्षों ने भी प्रतिध्वनि की. उस मुनि को, जो समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित है, मैं नमस्कार करता हूँ.

सरल भाव

सूत महर्षि कहते हैं कि जब व्यास महर्षि ने अपने पुत्र को संन्यास के मार्ग पर जाते देखा, तो वे विरह से व्याकुल होकर “हे पुत्र” कहकर पुकार उठे. उनके उस भाव में प्रकृति भी इतनी लीन हो गई कि वृक्षों ने भी उसी स्वर को प्रतिध्वनित किया. ऐसे महान मुनि को, जो सबके हृदय में निवास करते हैं, मैं नमस्कार करता हूँ.

श्लोकपाठ

यः स्वानुभावमखिलश्रुतिसारमेकम्
अध्यात्मदीपमतितितीर्षतां तमोऽन्धम् ।
संसारिणां करुणयाह पुराणगुह्यं
तं व्याससूनुमुपयामि गुरुम् मुनीनाम् ॥
॥ ०१.०२.०३ ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

यः स्व अनुभवम् अखिल श्रुति सारम् एकम्
अध्यात्म दीपम् अति तितीर्षताम् तमः अन्धम् ।
संसारिणाम् करुणया आह पुराण गुह्यम्
तम् व्यास सूनुम् उपयामि गुरुम् मुनीनाम् ॥

पद - पदार्थ

यः : जो; स्व अनुभवम् : अपने अनुभव से प्राप्त; अखिल श्रुति सारम् : समस्त वेदों का सार; एकम् : एकमात्र; अध्यात्म दीपम् : आध्यात्मिक दीप; अति तितीर्षताम् : पूर्णतः पार करना चाहने वालों के लिए; तमः अन्धम् : अज्ञानरूपी अन्धकार; संसारिणाम् : संसार में स्थित जनों के लिए; करुणया : करुणा से; आह : कहा; पुराण गुह्यम् : पुराण का रहस्य; तम् : उस महर्षि को; व्यास सूनुम् : व्यास के पुत्र को; उपयामि : मैं आश्रय लेता हूँ; गुरुम् : गुरु को; मुनीनाम् : मुनियों में श्रेष्ठ

यथातथ अनुवाद

संसार में स्थित जो लोग अज्ञानरूपी अन्धकार को पूर्णतः पार करना चाहते हैं, उनके लिए अपने अनुभव से प्राप्त, समस्त वेदों के सारस्वरूप, आध्यात्मिक दीप के समान उस पुराण के रहस्य को करुणा से कहने वाले व्यास के पुत्र उस गुरु का मैं आश्रय लेता हूँ.

सरल भाव

संसार के अज्ञान से बाहर निकलना चाहने वालों के लिए, अपने अनुभव से जाना हुआ वेदों का सार आध्यात्मिक प्रकाश के रूप में करुणा से प्रकट करने वाले व्यास महर्षि के पुत्र उस महान गुरु का मैं आश्रय लेता हूँ.

श्लोकपाठ

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
॥ ०१.०२.०४ ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

नारायणम् नमस्कृत्य नरम् च एव नर उत्तमम् ।
देवीम् सरस्वतीम् व्यासम् ततः जयम् उदीरयेत् ॥

पद - पदार्थ

नारायणम् : श्रीमन्नारायण को; नमस्कृत्य : नमस्कार करके; नरम् : नर को; च एव : और भी; नर उत्तमम् : मनुष्यों में श्रेष्ठ; देवीम् सरस्वतीम् : सरस्वती देवी को; व्यासम् : व्यास महर्षि को; ततः : उसके बाद; जयम् : जय अर्थात् श्रीमद्भागवतम्; उदीरयेत् : आरम्भ करना चाहिए

यथातथ अनुवाद

श्रीमन्नारायण को, मनुष्यों में श्रेष्ठ नर को, सरस्वती देवी को और व्यास महर्षि को नमस्कार करके, उसके बाद जय अर्थात् श्रीमद्भागवतम् का आरम्भ करना चाहिए.

सरल भाव

श्रीमन्नारायण और नरों में श्रेष्ठ नर को नमस्कार करने से नरा-नारायण ऋषियों का स्मरण होता है. उसी प्रकार सरस्वती देवी और व्यास महर्षि को प्रणाम करके इस पवित्र श्रीमद्भागवतम् का पाठ आरम्भ करना चाहिए. यह परम्परा ग्रन्थ के प्रारम्भ से पहले देवताओं का स्मरण करके उनके अनुग्रह की कामना करने को दर्शाती है.

श्लोकपाठ

मुनयः साधु पृष्टोऽहं भवद्भिर्लोकमङ्गलम् ।
यत्कृतः कृष्णसम्प्रश्नो येनात्मा सुप्रसीदति ॥
॥ ०१.०२.०५ ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

मुनयः साधु पृष्टः अहम् भवद्भिः लोक मङ्गलम् ।
यत् कृतः कृष्ण सम्प्रश्नः येन आत्मा सुप्रसीदति ॥

पद - पदार्थ

मुनयः : मुनियों ने; साधु : उत्तम प्रकार से; पृष्टः अहम् : मैं पूछा गया; भवद्भिः : आप लोगों द्वारा; लोक मङ्गलम् : लोक का कल्याण करने वाला; यत् : जो; कृतः : किया गया; कृष्ण सम्प्रश्नः : श्रीकृष्ण के विषय में प्रश्न; येन : जिसके द्वारा; आत्मा : आत्मा; सुप्रसीदति : अत्यन्त प्रसन्न होती है

यथातथ अनुवाद

हे मुनियों, आप लोगों द्वारा मुझसे उत्तम प्रकार से लोक के कल्याण से सम्बन्धित प्रश्न पूछा गया है. श्रीकृष्ण के विषय में किया गया यह प्रश्न ऐसा है, जिसके द्वारा आत्मा अत्यन्त प्रसन्न होती है.

सरल भाव

हे मुनियों, आपने जो प्रश्न पूछा है, वह अत्यन्त श्रेष्ठ और समस्त लोक के लिए कल्याणकारी है. श्रीकृष्ण के विषय में किया गया यह प्रश्न आत्मा को सच्ची शान्ति और संतोष प्रदान करता है.

श्लोकपाठ

स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे ।
अहैतुकी अप्रतिहता ययात्मा सुप्रसीदति ॥
॥ ०१.०२.०६ ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

सः वै पुंसाम् परः धर्मः यतः भक्तिः अधोक्षजे ।
अहैतुकी अप्रतिहता यया आत्मा सुप्रसीदति ॥

पद - पदार्थ

सः वै : वही वास्तव में; पुंसाम् : मनुष्यों का; परः धर्मः : सर्वोत्तम धर्म; यतः : जिससे; भक्तिः अधोक्षजे : अधोक्षज श्रीमन्नारायण में भक्ति; अहैतुकी : बिना किसी कारण के; अप्रतिहता : बिना किसी बाधा के; यया : जिसके द्वारा; आत्मा : आत्मा; सुप्रसीदति : पूर्णतः प्रसन्न होती है

यथातथ अनुवाद

मनुष्यों का वही वास्तव में सर्वोत्तम धर्म है, जिससे अधोक्षज श्रीमन्नारायण में कारणरहित और अविरुद्ध भक्ति उत्पन्न होती है. उस भक्ति के द्वारा आत्मा पूर्णतः प्रसन्न होती है.

सरल भाव

मनुष्य के लिए सबसे श्रेष्ठ धर्म वह है, जिसमें बिना किसी स्वार्थ के और बिना किसी बाधा के श्रीमन्नारायण के प्रति भक्ति उत्पन्न हो. ऐसी निर्मल भक्ति से आत्मा को सच्ची शान्ति और पूर्ण संतोष प्राप्त होता है.

श्लोकपाठ

वासुदेवे भगवति भक्तियोगः प्रयोजितः ।
जनयत्याशु वैराग्यं ज्ञानं च यदहैतुकम् ॥
॥ ०१.०२.०७ ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

वासुदेवे भगवति भक्ति योगः प्रयोजितः ।
जनयति आशु वैराग्यम् ज्ञानम् च यत् अहैतुकम् ॥

पद - पदार्थ

वासुदेवे भगवति : भगवान वासुदेव में; भक्ति योगः : भक्ति योग; प्रयोजितः : आचरण में लाया गया; जनयति : उत्पन्न करता है; आशु : शीघ्र; वैराग्यम् : वैराग्य; ज्ञानम् च : और ज्ञान; यत् : जो; अहैतुकम् : बिना किसी कारण के

यथातथ अनुवाद

भगवान वासुदेव में भक्ति योग का आचरण किया जाने पर, वह शीघ्र ही वैराग्य और बिना किसी कारण के ज्ञान को उत्पन्न करता है.

सरल भाव

जब भगवान वासुदेव के प्रति भक्ति की जाती है, तो वह मन की आसक्तियों को स्वाभाविक रूप से कम करके वैराग्य उत्पन्न करती है. उसी भक्ति से बिना किसी विशेष प्रयास के सच्चा ज्ञान भी प्रकट होता है.

श्लोकपाठ

धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां विष्वक्सेनकथासु यः ।
नोत्पादयेद्यदि रतिं श्रम एव हि केवलम् ॥
॥ ०१.०२.०८ ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

धर्मः स्व अनुष्ठितः पुंसाम् विष्वक्सेन कथासु यः ।
न उत्पादयेत् यदि रतिम् श्रमः एव हि केवलम् ॥

पद - पदार्थ

धर्मः : धर्म; स्व अनुष्ठितः : स्वयं आचरण किया गया; पुंसाम् : मनुष्यों का; विष्वक्सेन कथासु : विष्वक्सेन की कथाओं में; यः : जो; न उत्पादयेत् : उत्पन्न नहीं करे; यदि : यदि; रतिम् : प्रेम या रुचि; श्रमः एव : केवल परिश्रम ही; हि : वास्तव में; केवलम् : मात्र

यथातथ अनुवाद

मनुष्यों द्वारा आचरण किया गया धर्म यदि विष्वक्सेन की कथाओं में रुचि उत्पन्न नहीं करता, तो वह वास्तव में केवल परिश्रम मात्र ही होता है.

सरल भाव

मनुष्य कितना भी धर्म का पालन करे, यदि उससे श्रीमन्नारायण की कथाओं के प्रति प्रेम उत्पन्न नहीं होता, तो वह सम्पूर्ण प्रयास निष्फल परिश्रम ही बन जाता है.

श्लोकपाठ

धर्मस्य ह्यापवर्ग्यस्य नार्थोऽर्थायोपकल्पते ।
नार्थस्य धर्मैकान्तस्य कामो लाभाय हि स्मृतः ॥
॥ ०१.०२.०९ ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

धर्मस्य हि अपवर्ग्यस्य न अर्थः अर्थाय उपकल्पते ।
न अर्थस्य धर्म एकान्तस्य कामः लाभाय हि स्मृतः ॥

पद - पदार्थ

धर्मस्य : धर्म का; हि : निश्चय ही; अपवर्ग्यस्य : मोक्ष देने वाला; न अर्थः : अर्थ नहीं; अर्थाय उपकल्पते : धन के लिए प्रयुक्त होता है; न अर्थस्य : धन का नहीं; धर्म एकान्तस्य : जो केवल धर्म के लिए है; कामः : इन्द्रियसुख; लाभाय : लाभ के लिए; हि : वास्तव में; स्मृतः : कहा गया है

यथातथ अनुवाद

मोक्ष प्रदान करने वाला धर्म धन प्राप्त करने के लिए नहीं होता. और जो धन केवल धर्म के लिए है, वह भी इन्द्रियसुख की प्राप्ति के लिए नहीं माना गया है.

सरल भाव

मोक्ष की ओर ले जाने वाले धर्म का उपयोग धन कमाने के लिए नहीं करना चाहिए. उसी प्रकार धर्मपूर्वक प्राप्त धन का उपयोग इन्द्रियसुख के लिए करना भी उचित नहीं है. प्रत्येक साधन का उद्देश्य उच्च होना चाहिए, न कि केवल निम्न लाभ के लिए.

श्लोकपाठ

कामस्य न इन्द्रियप्रीतिः लाभो जीवेत यावता ।
जीवस्य तत्त्वजिज्ञासा नार्थो यश्चेह कर्मभिः ॥
॥ ०१.०२.१० ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

कामस्य न इन्द्रिय प्रीतिः लाभः जीवेत् यावता ।
जीवस्य तत्त्व जिज्ञासा न अर्थः यः च इह कर्मभिः ॥

पद - पदार्थ

कामस्य : काम का; न इन्द्रिय प्रीतिः : इन्द्रिय सुख नहीं; लाभः : उद्देश्य; जीवेत् यावता : जितना जीवन के लिए आवश्यक हो; जीवस्य : जीव का; तत्त्व जिज्ञासा : तत्त्व को जानने की इच्छा; न अर्थः : लक्ष्य नहीं; यः च : और जो; इह कर्मभिः : इस संसार में कर्मों के द्वारा

यथातथ अनुवाद

काम का उद्देश्य इन्द्रिय सुख नहीं है, बल्कि केवल उतना ही होना चाहिए जितना जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक है. जीव का वास्तविक लक्ष्य तत्त्व को जानने की जिज्ञासा है, न कि इस संसार में कर्मों के द्वारा प्राप्त होने वाले फल.

सरल भाव

मनुष्य की इच्छाएँ केवल इन्द्रियसुख के लिए नहीं होनी चाहिए, बल्कि जीवन को चलाने भर तक सीमित रहनी चाहिए. जीवन का सच्चा उद्देश्य तत्त्व को जानने की जिज्ञासा है, न कि कर्मों से मिलने वाले फलों को ही अंतिम लक्ष्य मानना.

श्लोकपाठ

वदन्ति तत् तत्त्वविदः तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम् ।
ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥
॥ ०१.०२.११ ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

वदन्ति तत् तत्त्व विदः तत्त्वम् यत् ज्ञानम् अद्वयम् ।
ब्रह्म इति परमात्मा इति भगवान् इति शब्द्यते ॥

पद - पदार्थ

वदन्ति : कहते हैं; तत् तत्त्व विदः : उस तत्त्व को जानने वाले; तत्त्वम् : परम सत्य; यत् : जो; ज्ञानम् अद्वयम् : अद्वितीय ज्ञान स्वरूप; ब्रह्म इति : “ब्रह्म” के रूप में; परमात्मा इति : “परमात्मा” के रूप में; भगवान् इति : “भगवान” के रूप में; शब्द्यते : कहा जाता है

यथातथ अनुवाद

उस तत्त्व को जानने वाले कहते हैं कि वह परम सत्य अद्वितीय ज्ञान स्वरूप है. वही “ब्रह्म”, “परमात्मा” और “भगवान” के रूप में कहा जाता है.

सरल भाव

जो ज्ञानीजन परम सत्य को समझते हैं, वे बताते हैं कि वह एक ही अद्वैत ज्ञान स्वरूप है. उसी एक सत्य को अनुभव के अनुसार ब्रह्म, परमात्मा और भगवान के रूप में जाना जाता है.

श्लोकपाठ

तच्छ्रद्धधानाः मुनयो ज्ञानवैराग्ययुक्तया ।
पश्यन्त्यात्मनि चात्मानं भक्त्या श्रुतगृहीतया ॥
॥ ०१.०२.१२ ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

तत् श्रद्धधानाः मुनयः ज्ञान वैराग्य युक्तया ।
पश्यन्ति आत्मनि च आत्मानम् भक्त्या श्रुत गृहीतया ॥

पद - पदार्थ

तत् श्रद्धधानाः : उस तत्त्व में श्रद्धा रखने वाले; मुनयः : मुनि; ज्ञान वैराग्य युक्तया : ज्ञान और वैराग्य से युक्त; पश्यन्ति : देखते हैं; आत्मनि : अपने भीतर; : और; आत्मानम् : परमात्मा को; भक्त्या : भक्ति से; श्रुत गृहीतया : श्रुति से ग्रहण की हुई

यथातथ अनुवाद

उस तत्त्व में श्रद्धा रखने वाले मुनि, ज्ञान और वैराग्य से युक्त होकर, श्रुति से ग्रहण की हुई भक्ति के द्वारा अपने ही भीतर परमात्मा को देखते हैं.

सरल भाव

जो मुनि परम सत्य में दृढ़ श्रद्धा रखते हैं, वे ज्ञान और वैराग्य के साथ, शास्त्रों से प्राप्त भक्ति के माध्यम से अपने ही हृदय में परमात्मा का अनुभव करते हैं.

श्लोकपाठ

अतः पुम्भिर्द्विजश्रेष्ठा वर्णाश्रमविभागशः ।
स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धिर्हरितोषणम् ॥
॥ ०१.०२.१३ ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

अतः पुम्भिः द्विज श्रेष्ठाः वर्ण आश्रम विभागशः ।
स्व अनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धिः हरि तोषणम् ॥

पद - पदार्थ

अतः : इसलिए; पुम्भिः : मनुष्यों द्वारा; द्विज श्रेष्ठाः : हे द्विजों में श्रेष्ठ; वर्ण आश्रम विभागशः : वर्णाश्रम के विभाजन के अनुसार; स्व अनुष्ठितस्य धर्मस्य : स्वयं आचरण किए गए धर्म का; संसिद्धिः : पूर्ण फल; हरि तोषणम् : श्रीहरि को प्रसन्न करना

यथातथ अनुवाद

इसलिए, हे द्विजों में श्रेष्ठ, मनुष्यों द्वारा वर्णाश्रम के विभाजन के अनुसार आचरण किए गए धर्म का पूर्ण फल श्रीहरि को प्रसन्न करना ही है.

सरल भाव

मनुष्य चाहे वर्णाश्रम धर्मों का कितना भी निष्ठापूर्वक पालन करे, उसका वास्तविक फल श्रीहरि को प्रसन्न करना ही है. उनकी प्रसन्नता ही धर्म के आचरण को पूर्णता प्रदान करती है.

श्लोकपाठ

तस्मादेकेन मनसा भगवान् सात्वतां पतिः ।
श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च ध्येयः पूज्यश्च नित्यदा ॥
॥ ०१.०२.१४ ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

तस्मात् एकेन मनसा भगवान् सात्वताम् पतिः ।
श्रोतव्यः कीर्तितव्यः च ध्येयः पूज्यः च नित्यदा ॥

पद - पदार्थ

तस्मात् : इसलिए; एकेन मनसा : एकाग्र मन से; भगवान् : भगवान; सात्वताम् पतिः : सात्वतों के स्वामी; श्रोतव्यः : सुनने योग्य; कीर्तितव्यः च : और कीर्तन करने योग्य; ध्येयः : ध्यान करने योग्य; पूज्यः च : और पूजनीय; नित्यदा : सदा

यथातथ अनुवाद

इसलिए, एकाग्र मन से सात्वतों के स्वामी भगवान को सदा सुनना चाहिए, उनका कीर्तन करना चाहिए, उनका ध्यान करना चाहिए और उनकी पूजा करनी चाहिए.

सरल भाव

इसलिए, एकाग्रचित्त होकर श्रीमन्नारायण का निरन्तर श्रवण, कीर्तन, ध्यान और पूजा करनी चाहिए. इस प्रकार मन को सदा उनके साथ जोड़े रखना चाहिए.

श्लोकपाठ

यदनुध्यासिना युक्ताः कर्मग्रन्थिनिबन्धनम् ।
छिन्दन्ति कोविदास्तस्य को न कुर्यात् कथारतिम् ॥
॥ ०१.०२.१५ ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

यत् अनुध्यासिना युक्ताः कर्म ग्रन्थि निबन्धनम् ।
छिन्दन्ति कोविदाः तस्य कः न कुर्यात् कथा रतिम् ॥

पद - पदार्थ

यत् अनुध्यासिना : भगवान के निरन्तर ध्यान से; युक्ताः : जुड़े हुए; कर्म ग्रन्थि निबन्धनम् : कर्म के बन्धनों की गाँठ; छिन्दन्ति : काट देते हैं; कोविदाः : ज्ञानीजन; तस्य : उस भगवान के; कः : कौन; न कुर्यात् : नहीं करेगा; कथा रतिम् : कथा में रुचि

यथातथ अनुवाद

भगवान के निरन्तर ध्यान में लगे हुए ज्ञानीजन कर्मबन्धनों की गाँठ को काट देते हैं. ऐसे भगवान की कथाओं में रुचि कौन नहीं करेगा.

सरल भाव

जो लोग भगवान का निरन्तर ध्यान करते हैं, वे कर्मबन्धनों से मुक्त हो जाते हैं. ऐसे महान प्रभाव वाले भगवान की कथाओं के प्रति आकर्षण न होना सम्भव ही नहीं है.

श्लोकपाठ

शुश्रूषोः श्रद्धधानस्य वासुदेवकथारुचिः ।
स्यान्महत्सेवया विप्राः पुण्यतीर्थनिषेवणात् ॥
॥ ०१.०२.१६ ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

शुश्रूषोः श्रद्धधानस्य वासुदेव कथा रुचिः ।
स्यात् महत् सेवया विप्राः पुण्य तीर्थ निषेवणात् ॥

पद - पदार्थ

शुश्रूषोः : सुनने की इच्छा रखने वाले के; श्रद्धधानस्य : श्रद्धा रखने वाले के; वासुदेव कथा रुचिः : वासुदेव की कथाओं में रुचि; स्यात् : उत्पन्न होती है; महत् सेवया : महात्माओं की सेवा से; विप्राः : हे ब्राह्मणों; पुण्य तीर्थ निषेवणात् : पवित्र तीर्थों के सेवन से

यथातथ अनुवाद

हे ब्राह्मणों, जो सुनने की इच्छा और श्रद्धा रखते हैं, उनमें वासुदेव की कथाओं के प्रति रुचि महात्माओं की सेवा और पवित्र तीर्थों के सेवन से उत्पन्न होती है.

सरल भाव

जो लोग श्रद्धा के साथ सुनने की इच्छा रखते हैं, उनमें श्रीवासुदेव की कथाओं के प्रति स्वाभाविक रुचि महात्माओं की सेवा और पवित्र तीर्थों के संग से विकसित होती है.

श्लोकपाठ

शृण्वतां स्वकथाः कृष्णः पुण्यश्रवणकीर्तनः ।
हृद्यन्तःस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत्सताम् ॥
॥ ०१.०२.१७ ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

शृण्वताम् स्व कथाः कृष्णः पुण्य श्रवण कीर्तनः ।
हृदि अन्तःस्थः हि अभद्राणि विधुनोति सुहृत् सताम् ॥

पद - पदार्थ

शृण्वताम् : सुनने वालों के; स्व कथाः : अपनी कथाएँ; कृष्णः : श्रीकृष्ण; पुण्य श्रवण कीर्तनः : जिनका श्रवण और कीर्तन पवित्र करने वाला है; हृदि अन्तःस्थः : हृदय में स्थित; हि : वास्तव में; अभद्राणि : अशुभताओं को; विधुनोति : दूर करते हैं; सुहृत् सताम् : सज्जनों के हितकारी

यथातथ अनुवाद

अपनी कथाओं को सुनने वालों के लिए, जिनका श्रवण और कीर्तन पवित्र करने वाला है, वे श्रीकृष्ण हृदय में स्थित होकर, सज्जनों के हितकारी होकर, उनकी अशुभताओं को दूर करते हैं.

सरल भाव

जो लोग श्रद्धा से भगवान की कथाएँ सुनते हैं, उनके हृदय में स्थित श्रीकृष्ण धीरे-धीरे सभी अशुद्धियों को दूर करते हैं. वे सदा सज्जनों के हितकारी होकर उनके अन्तःकरण को शुद्ध करते हैं.

श्लोकपाठ

नष्टप्रायेष्वभद्रेषु नित्यं भागवतसेवया ।
भगवत्युत्तमश्लोके भक्तिर्भवति नैष्ठिकी ॥
॥ ०१.०२.१८ ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

नष्ट प्रायेषु अभद्रेषु नित्यम् भागवत सेवया ।
भगवति उत्तम श्लोके भक्तिः भवति नैष्ठिकी ॥

पद - पदार्थ

नष्ट प्रायेषु अभद्रेषु : अधिकांशतः नष्ट हुए अशुभों में; नित्यम् : निरन्तर; भागवत सेवया : भागवत की सेवा से; भगवति उत्तम श्लोके : उत्तम श्लोकों से स्तुत भगवान में; भक्तिः : भक्ति; भवति : उत्पन्न होती है; नैष्ठिकी : दृढ़ और अचल

यथातथ अनुवाद

जब अशुभताएँ अधिकांशतः नष्ट हो जाती हैं, तब निरन्तर भागवत सेवा के द्वारा उत्तम श्लोकों से स्तुत भगवान में दृढ़ भक्ति उत्पन्न होती है.

सरल भाव

जब निरन्तर भागवत सेवा के द्वारा हृदय की अशुद्धियाँ काफी हद तक दूर हो जाती हैं, तब श्रीमन्नारायण के प्रति स्थिर और अचल भक्ति स्वाभाविक रूप से स्थापित हो जाती है.

श्लोकपाठ

तदा रजस्तमोभावाः कामलोभादयश्च ये ।
चेत एतैरनाविद्धं स्थितं सत्त्वे प्रसीदति ॥
॥ ०१.०२.१९ ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

तदा रजः तमः भावाः काम लोभ आदयः च ये ।
चेतः एतैः अनाविद्धम् स्थितम् सत्त्वे प्रसीदति ॥

पद - पदार्थ

तदा : तब; रजः तमः भावाः : रजोगुण और तमोगुण के प्रभाव; काम लोभ आदयः च ये : काम, लोभ आदि जो हैं; चेतः : मन; एतैः : इनसे; अनाविद्धम् : आघातित नहीं, प्रभावित नहीं; स्थितम् सत्त्वे : सत्त्वगुण में स्थित; प्रसीदति : शान्त और प्रसन्न होता है

यथातथ अनुवाद

तब रजोगुण और तमोगुण के प्रभाव, काम, लोभ आदि से रहित होकर मन इनसे प्रभावित हुए बिना सत्त्वगुण में स्थित होकर प्रसन्न हो जाता है.

सरल भाव

तब रजोगुण और तमोगुण से उत्पन्न काम और लोभ जैसे विकार कम हो जाते हैं. मन इनसे अछूता रहकर सत्त्वगुण में स्थिर होकर शान्त और निर्मल बन जाता है.

श्लोकपाठ

एवं प्रसन्नमनसो भगवद्भक्तियोगतः ।
भगवत्तत्त्वविज्ञानं मुक्तसंगस्य जायते ॥
॥ ०१.०२.२० ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

एवम् प्रसन्न मनसः भगवत् भक्ति योगतः ।
भगवत् तत्त्व विज्ञानम् मुक्त संगस्य जायते ॥

पद - पदार्थ

एवम् : इस प्रकार; प्रसन्न मनसः : प्रसन्न मन वाले के; भगवत् भक्ति योगतः : भगवान में भक्ति योग से; भगवत् तत्त्व विज्ञानम् : भगवान के तत्त्व का वास्तविक ज्ञान; मुक्त संगस्य : आसक्ति से मुक्त हुए के; जायते : उत्पन्न होता है

यथातथ अनुवाद

इस प्रकार, प्रसन्न मन वाले व्यक्ति में भगवान के प्रति भक्ति योग के द्वारा, आसक्ति से मुक्त होने पर भगवान के तत्त्व का वास्तविक ज्ञान उत्पन्न होता है.

सरल भाव

इस प्रकार जब मन शान्त और प्रसन्न हो जाता है और भक्ति में स्थिर होता है, तब आसक्तियों से मुक्ति मिलती है. उसी अवस्था में भगवान के वास्तविक स्वरूप का स्पष्ट ज्ञान अपने आप प्रकट होता है.

श्लोकपाठ

भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि दृष्ट एवात्मनीश्वरे ॥
॥ ०१.०२.२१ ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

भिद्यते हृदय ग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्व संशयाः ।
क्षीयन्ते च अस्य कर्माणि दृष्टे एव आत्मनि ईश्वरे ॥

पद - पदार्थ

भिद्यते : टूट जाता है; हृदय ग्रन्थिः : हृदय की गाँठ; छिद्यन्ते : कट जाते हैं; सर्व संशयाः : सभी संदेह; क्षीयन्ते : समाप्त हो जाते हैं; : और; अस्य : उसके; कर्माणि : कर्म; दृष्टे एव : दर्शन होते ही; आत्मनि ईश्वरे : आत्मा में स्थित ईश्वर का

यथातथ अनुवाद

हृदय की गाँठ टूट जाती है, सभी संदेह कट जाते हैं और उसके कर्म भी समाप्त हो जाते हैं, जैसे ही आत्मा में स्थित ईश्वर का दर्शन होता है.

सरल भाव

जब व्यक्ति अपने ही भीतर स्थित ईश्वर का अनुभव करता है, तब उसके हृदय के बन्धन टूट जाते हैं. सभी संदेह दूर हो जाते हैं और कर्मों के बन्धन भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाते हैं.

श्लोकपाठ

अतो वै कवयो नित्यं भक्तिं परमया मुदा ।
वासुदेवे भगवति कुर्वन्त्यात्मप्रसादनीम् ॥
॥ ०१.०२.२२ ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

अतः वै कवयः नित्यम् भक्तिम् परमया मुदा ।
वासुदेवे भगवति कुर्वन्ति आत्म प्रसादनीम् ॥

पद - पदार्थ

अतः वै : इसलिए वास्तव में; कवयः : ज्ञानीजन; नित्यम् : सदा; भक्तिम् : भक्ति; परमया मुदा : परम आनन्द के साथ; वासुदेवे भगवति : भगवान वासुदेव में; कुर्वन्ति : करते हैं; आत्म प्रसादनीम् : आत्मा को प्रसन्न करने वाली

यथातथ अनुवाद

इसलिए वास्तव में ज्ञानीजन सदा परम आनन्द के साथ भगवान वासुदेव में ऐसी भक्ति करते हैं, जो आत्मा को प्रसन्न करने वाली होती है.

सरल भाव

इसलिए ज्ञानीजन सदा आनन्दपूर्वक श्रीवासुदेव के प्रति भक्ति करते हैं. ऐसी भक्ति आत्मा को गहराई से शान्त और प्रसन्न बनाती है.

श्लोकपाठ

सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्गुणास्तैः
युक्तः परः पुरुष एक इहास्य धत्ते ।
स्थित्यादये हरिविरिञ्चिहर इति संज्ञाः
श्रेयांसि तत्र खलु सत्त्वतनोर् नृणां स्युः ॥
॥ ०१.०२.२३ ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

सत्त्वम् रजः तमः इति प्रकृतेः गुणाः तैः
युक्तः परः पुरुषः एकः इह अस्य धत्ते ।
स्थिति आदये हरि विरिञ्चि हर इति संज्ञाः
श्रेयांसि तत्र खलु सत्त्व तनोः नृणाम् स्युः ॥

पद - पदार्थ

सत्त्वम् रजः तमः इति : सत्त्व, रजस और तमस; प्रकृतेः गुणाः : प्रकृति के गुण; तैः : उनसे; युक्तः : युक्त होकर; परः पुरुषः : परम पुरुष; एकः : एक ही; इह : इस जगत में; अस्य धत्ते : इन्हें धारण करता है; स्थिति आदये : स्थिति आदि कार्यों के लिए; हरि विरिञ्चि हर इति संज्ञाः : “हरि”, “विरिञ्चि” और “हर” नाम से; श्रेयांसि : कल्याण; तत्र खलु : उनमें वास्तव में; सत्त्व तनोः : सत्त्वगुण रूप में; नृणाम् : मनुष्यों के लिए; स्युः : होते हैं

यथातथ अनुवाद

सत्त्व, रजस और तमस नामक प्रकृति के गुणों से युक्त होकर, एक ही परम पुरुष इस जगत में स्थिति आदि कार्यों के लिए “हरि”, “विरिञ्चि” और “हर” नामों को धारण करता है. उनमें वास्तव में मनुष्यों के लिए कल्याण सत्त्वगुण रूप से ही होता है.

सरल भाव

एक ही परम पुरुष प्रकृति के सत्त्व, रजस और तमस गुणों के माध्यम से सृष्टि, स्थिति और लय के कार्य करता है. इसी कारण वह हरि, विरिञ्चि और हर नामों से जाना जाता है. किन्तु मनुष्यों के लिए सच्चा कल्याण सत्त्वगुण के माध्यम से ही प्राप्त होता है.

श्लोकपाठ

पार्थिवाद्दारुणो धूमः तस्मादग्निस्त्रयीमयः ।
तमसस्तु रजस्तस्मात् सत्त्वं यद् ब्रह्मदर्शनम् ॥
॥ ०१.०२.२४ ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

पार्थिवात् दारुणः धूमः तस्मात् अग्निः त्रयीमयः ।
तमसः तु रजः तस्मात् सत्त्वम् यत् ब्रह्म दर्शनम् ॥

पद - पदार्थ

पार्थिवात् : पृथ्वी से; दारुणः : लकड़ी; धूमः : धुआँ; तस्मात् : उससे; अग्निः : अग्नि; त्रयीमयः : वेदत्रय स्वरूप; तमसः तु : तमोगुण से; रजः : रजोगुण; तस्मात् : उससे; सत्त्वम् : सत्त्वगुण; यत् : जो; ब्रह्म दर्शनम् : ब्रह्म का दर्शन कराने वाला

यथातथ अनुवाद

पृथ्वी से लकड़ी, लकड़ी से धुआँ और धुएँ से अग्नि उत्पन्न होती है, जो वेदत्रय स्वरूप होती है. इसी प्रकार तमोगुण से रजोगुण और उससे सत्त्वगुण उत्पन्न होता है, जो ब्रह्म का दर्शन कराने वाला होता है.

सरल भाव

जैसे पृथ्वी से लकड़ी, लकड़ी से धुआँ और अन्त में अग्नि प्रकट होती है, वैसे ही तमोगुण से रजोगुण और उससे सत्त्वगुण विकसित होता है. यही सत्त्वगुण मनुष्य को उच्च अवस्था तक ले जाकर ब्रह्मतत्त्व का अनुभव कराने में सहायक होता है.

श्लोकपाठ

भेजिरे मुनयोऽथाग्रे भगवन्तमधोक्षजम् ।
सत्त्वं विशुद्धं क्षेमाय कल्पन्ते येऽनुतानिह ॥
॥ ०१.०२.२५ ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

भेजिरे मुनयः अथ अग्रे भगवन्तम् अधोक्षजम् ।
सत्त्वम् विशुद्धम् क्षेमाय कल्पन्ते ये अनुतान् इह ॥

पद - पदार्थ

भेजिरे : आश्रय लिया; मुनयः : मुनियों ने; अथ अग्रे : प्रारम्भ में ही; भगवन्तम् अधोक्षजम् : अधोक्षज भगवान को; सत्त्वम् विशुद्धम् : शुद्ध सत्त्वगुण; क्षेमाय : कल्याण के लिए; कल्पन्ते : अपनाते हैं; ये अनुतान् इह : जो इस संसार में उनका अनुसरण करते हैं

यथातथ अनुवाद

मुनियों ने प्रारम्भ में ही अधोक्षज भगवान का आश्रय लिया. वे कल्याण के लिए शुद्ध सत्त्वगुण को अपनाते हैं, और जो इस संसार में उनका अनुसरण करते हैं, वे भी ऐसा ही करते हैं.

सरल भाव

मुनियों ने आरम्भ से ही अधोक्षज श्रीमन्नारायण का आश्रय लेकर शुद्ध सत्त्वगुण को अपनाया. इस संसार में जो लोग उनके मार्ग का अनुसरण करते हैं, वे भी अपने कल्याण के लिए उसी मार्ग को ग्रहण करते हैं.

श्लोकपाठ

मुमुक्षवो घोररूपान् हित्वा भूतपतीनथ ।
नारायणकलाः शान्ता भजन्ति ह्यनसूयवः ॥
॥ ०१.०२.२६ ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

मुमुक्षवः घोर रूपान् हित्वा भूत पतीन् अथ ।
नारायण कलाः शान्ताः भजन्ति हि अनसूयवः ॥

पद - पदार्थ

मुमुक्षवः : मोक्ष चाहने वाले; घोर रूपान् : भयानक रूपों को; हित्वा : त्यागकर; भूत पतीन् अथ : भूतों के अधिपतियों को भी; नारायण कलाः : नारायण के अवतार रूपों को; शान्ताः : शान्त स्वभाव वाले; भजन्ति : भजते हैं; हि : वास्तव में; अनसूयवः : जिनमें ईर्ष्या नहीं है

यथातथ अनुवाद

मोक्ष चाहने वाले लोग भयानक रूपों और भूतों के अधिपतियों को त्यागकर, शान्त स्वभाव वाले और ईर्ष्या रहित होकर नारायण के अवतार रूपों को भजते हैं.

सरल भाव

जो लोग मोक्ष की इच्छा रखते हैं, वे भय उत्पन्न करने वाले रूपों और अन्य अधिष्ठाताओं को छोड़कर, शान्त और निष्पक्ष भाव से श्रीमन्नारायण के अवतार स्वरूपों की भक्ति करते हैं.

श्लोकपाठ

रजस्तमः प्रकृतयः समशीला भजन्ति वै ।
पितृभूतप्रजेशादीन् श्रियैश्वर्यप्रजेप्सवः ॥
॥ ०१.०२.२७ ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

रजः तमः प्रकृतयः सम शीलाः भजन्ति वै ।
पितृ भूत प्रजेश आदीन् श्रिया ऐश्वर्य प्रजा ईप्सवः ॥

पद - पदार्थ

रजः तमः प्रकृतयः : रजोगुण और तमोगुण वाले; सम शीलाः : ऐसे ही स्वभाव वाले; भजन्ति वै : वास्तव में भजते हैं; पितृ भूत प्रजेश आदीन् : पितरों, भूतों और प्रजापतियों आदि को; श्रिया ऐश्वर्य प्रजा ईप्सवः : धन, ऐश्वर्य और संतान चाहने वाले

यथातथ अनुवाद

रजोगुण और तमोगुण वाले लोग, ऐसे ही स्वभाव के होकर, वास्तव में पितरों, भूतों और प्रजापतियों आदि को भजते हैं. वे धन, ऐश्वर्य और संतान की इच्छा रखने वाले होते हैं.

सरल भाव

जो लोग रजोगुण और तमोगुण के प्रभाव में होते हैं, वे अपने स्वभाव के अनुसार पितरों, भूतों और प्रजापतियों की उपासना करते हैं. वे प्रायः धन, ऐश्वर्य और संतान जैसे सांसारिक लाभों की इच्छा रखते हैं.

श्लोकपाठ

वासुदेवपरा वेदा वासुदेवपरा मखाः ।
वासुदेवपरा योगा वासुदेवपराः क्रियाः ॥
॥ ०१.०२.२८ ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

वासुदेव पराः वेदाः वासुदेव पराः मखाः ।
वासुदेव पराः योगाः वासुदेव पराः क्रियाः ॥

पद - पदार्थ

वासुदेव पराः वेदाः : वासुदेव को लक्ष्य करने वाले वेद; वासुदेव पराः मखाः : वासुदेव को लक्ष्य करने वाले यज्ञ; वासुदेव पराः योगाः : वासुदेव को लक्ष्य करने वाले योग; वासुदेव पराः क्रियाः : वासुदेव को लक्ष्य करने वाले कर्म

यथातथ अनुवाद

वेद वासुदेव को ही लक्ष्य करते हैं. यज्ञ वासुदेव को ही लक्ष्य करते हैं. योग वासुदेव को ही लक्ष्य करते हैं. कर्म भी वासुदेव को ही लक्ष्य करते हैं.

सरल भाव

वेद, यज्ञ, योग और सभी कर्म अन्ततः श्रीवासुदेव की ओर ही ले जाते हैं. इन सबका वास्तविक उद्देश्य वही है.

श्लोकपाठ

वासुदेवपरं ज्ञानं वासुदेवपरं तपः ।
वासुदेवपरो धर्मो वासुदेवपरा गतिः ॥
॥ ०१.०२.२९ ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

वासुदेव परम् ज्ञानम् वासुदेव परम् तपः ।
वासुदेव परः धर्मः वासुदेव परा गतिः ॥

पद - पदार्थ

वासुदेव परम् ज्ञानम् : वासुदेव को लक्ष्य करने वाला ज्ञान; वासुदेव परम् तपः : वासुदेव को लक्ष्य करने वाला तप; वासुदेव परः धर्मः : वासुदेव को लक्ष्य करने वाला धर्म; वासुदेव परा गतिः : वासुदेव ही परम गन्तव्य

यथातथ अनुवाद

ज्ञान वासुदेव को ही लक्ष्य करता है. तप वासुदेव को ही लक्ष्य करता है. धर्म वासुदेव को ही लक्ष्य करता है. और गन्तव्य भी वासुदेव ही परम है.

सरल भाव

ज्ञान, तप और धर्म सभी अन्ततः श्रीवासुदेव की ओर ही ले जाते हैं. मनुष्य का परम गन्तव्य भी वही है.

श्लोकपाठ

स एवेदं ससर्जाग्रे भगवानात्ममायया ।
सदसद्रूपया चासौ गुणमया गुणो विभुः ॥
॥ ०१.०२.३० ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

सः एव इदम् ससर्ज अग्रे भगवान् आत्म मायया ।
सत् असत् रूपया च असौ गुण मया गुणः विभुः ॥

पद - पदार्थ

सः एव : वही; इदम् : इस जगत को; ससर्ज : सृजा; अग्रे : आरम्भ में; भगवान् : भगवान; आत्म मायया : अपनी माया से; सत् असत् रूपया : सत् और असत् रूप में; : और; असौ : वही; गुण मया : गुणमय रूप में; गुणः विभुः : गुणों से परे व्यापक सत्ता

यथातथ अनुवाद

वही भगवान ने आरम्भ में इस जगत की सृष्टि अपनी माया से की. यह जगत सत् और असत् रूप में प्रकट होता है, और वह स्वयं गुणमय रूप में प्रतीत होते हुए भी वास्तव में गुणों से परे व्यापक हैं.

सरल भाव

श्रीमन्नारायण ने ही अपनी माया शक्ति से इस सृष्टि का प्रारम्भ किया. यह जगत सत् और असत् रूपों में दिखाई देता है, और यद्यपि वह प्रकृति के गुणों के माध्यम से व्यक्त होते हैं, फिर भी वे वास्तव में उन गुणों से परे परम सत्ता हैं.

श्लोकपाठ

तया विलसितेष्वेषु गुणेषु गुणवानिव ।
अन्तः प्रविष्ट आभाति विज्ञानेन विजृम्भितः ॥
॥ ०१.०२.३१ ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

तया विलसितेषु एषु गुणेषु गुणवान् इव ।
अन्तः प्रविष्टः आभाति विज्ञानेन विजृम्भितः ॥

पद - पदार्थ

तया : उस माया से; विलसितेषु : प्रकट हुए; एषु गुणेषु : इन गुणों में; गुणवान् इव : गुणों से युक्त के समान; अन्तः प्रविष्टः : भीतर प्रवेश किया हुआ; आभाति : प्रकट होता है; विज्ञानेन : पूर्ण ज्ञान से; विजृम्भितः : विस्तृत होकर प्रकट हुआ

यथातथ अनुवाद

उस माया से प्रकट हुए इन गुणों में, गुणों से युक्त के समान प्रतीत होते हुए, भीतर प्रवेश किए हुए वह पूर्ण ज्ञान से प्रकाशित होकर प्रकट होता है.

सरल भाव

भगवान अपनी माया से प्रकट हुए इन गुणों में स्थित दिखाई देते हैं, मानो वे गुणों से युक्त हों. किन्तु वास्तव में वे भीतर ही भीतर पूर्ण ज्ञान स्वरूप में प्रकाशित रहते हैं.

श्लोकपाठ

यथा ह्यवहितो वह्निः दारुष्वेकः स्वयोनिषु ।
नानेव भाति विश्वात्मा भूतेषु च तथा पुमान् ॥
॥ ०१.०२.३२ ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

यथा हि अवहितः वह्निः दारुषु एकः स्व योनिषु ।
नाना इव भाति विश्व आत्मा भूतेषु च तथा पुमान् ॥

पद - पदार्थ

यथा हि : जैसे कि; अवहितः वह्निः : छिपी हुई अग्नि; दारुषु : लकड़ियों में; एकः : एक ही; स्व योनिषु : अपने-अपने आधारों में; नाना इव भाति : अनेक के समान दिखाई देती है; विश्व आत्मा : विश्व का आत्मा; भूतेषु : सभी प्राणियों में; : और; तथा : उसी प्रकार; पुमान् : परम पुरुष

यथातथ अनुवाद

जैसे लकड़ियों में छिपी हुई अग्नि एक ही होते हुए भी अपने-अपने आधारों में अनेक के समान दिखाई देती है, उसी प्रकार विश्व का आत्मा परम पुरुष सभी प्राणियों में अनेक के समान प्रतीत होता है.

सरल भाव

जैसे एक ही अग्नि विभिन्न लकड़ियों में छिपकर अनेक रूपों में दिखाई देती है, वैसे ही एक ही परम पुरुष समस्त प्राणियों में उपस्थित होकर अनेक रूपों में प्रकट होता हुआ प्रतीत होता है.

श्लोकपाठ

असौ गुणमयैर्भावैर्भूतसूक्ष्मेन्द्रियात्मभिः ।
स्वनिर्मितेषु निर्विष्टो भुङ्क्ते भूतेषु तद्गुणान् ॥
॥ ०१.०२.३३ ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

असौ गुण मयैः भावैः भूत सूक्ष्म इन्द्रिय आत्मभिः ।
स्व निर्मितेषु निर्विष्टः भुङ्क्ते भूतेषु तत् गुणान् ॥

पद - पदार्थ

असौ : वही; गुण मयैः भावैः : गुणमय भावों से; भूत सूक्ष्म इन्द्रिय आत्मभिः : भूत, सूक्ष्म शरीर, इन्द्रिय और आत्म रूपों से; स्व निर्मितेषु : अपनी रचित वस्तुओं में; निर्विष्टः : प्रवेश किया हुआ; भुङ्क्ते : अनुभव करते हैं; भूतेषु : प्राणियों में; तत् गुणान् : उनके गुणों को

यथातथ अनुवाद

वही भगवान गुणमय भावों के द्वारा, भूत, सूक्ष्म शरीर, इन्द्रिय और आत्म रूपों के माध्यम से अपनी रचना में प्रवेश करके प्राणियों में उनके गुणों का अनुभव करते हैं.

सरल भाव

श्रीमन्नारायण अपनी सृष्टि में प्रवेश करके भूत, इन्द्रिय और सूक्ष्म शरीर के माध्यम से गुणों के प्रभाव का अनुभव करते हुए प्रतीत होते हैं. किन्तु यह अनुभव भी उनकी माया शक्ति के द्वारा ही प्रकट होता है.

श्लोकपाठ

भावयत्येष सत्त्वेन लोकान् वै लोकभावनः ।
लीलावतारानुरतो देवतिर्यङ्नरादिषु ॥
॥ ०१.०२.३४ ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

भावयति एषः सत्त्वेन लोकान् वै लोक भावनः ।
लीला अवतार अनुरतः देव तिर्यङ् नर आदिषु ॥

पद - पदार्थ

भावयति : पोषण करता है; एषः : वही; सत्त्वेन : सत्त्वगुण से; लोकान् : लोकों को; वै : निश्चय ही; लोक भावनः : लोकों का पालन करने वाला; लीला अवतार अनुरतः : लीला अवतारों में प्रवृत्त; देव तिर्यङ् नर आदिषु : देव, पशु और मनुष्यों आदि में

यथातथ अनुवाद

वही सत्त्वगुण से लोकों का पोषण करता है, और लोकों का पालन करने वाला होकर लीला अवतारों में प्रवृत्त रहता है, तथा देव, पशु और मनुष्यों आदि में अवतार लेता है.

सरल भाव

श्रीमन्नारायण सत्त्वगुण के माध्यम से समस्त लोकों का पालन करते हैं. वे लीला अवतारों के द्वारा देवताओं, पशुओं और मनुष्यों आदि अनेक रूपों में प्रकट होकर जगत का संचालन करते हैं.

अध्याय समाप्ति श्लोकपाठ

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमेश्वर्यां संहितायाम् ।
प्रथमस्कन्धे भगवद्भक्तितत्त्वनिरूपण नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥
॥ ०१.०२ ॥

श्रवणम्

पदविच्छेद

इति श्रीमद्भागवते महा पुराणे पारमेश्वर्यां संहितायाम् ।
प्रथम स्कन्धे भगवत् भक्ति तत्त्व निरूपण नाम द्वितीयः अध्यायः ॥

पद - पदार्थ

इति : इस प्रकार; श्रीमद्भागवते : श्रीमद्भागवतम् में; महापुराणे : महापुराण में; पारमेश्वर्यां : परमेश्वर से सम्बन्धित; संहितायाम् : संहिता में; प्रथम स्कन्धे : प्रथम स्कन्ध में; भगवद्भक्ति तत्त्व निरूपण नाम : भगवद्भक्ति के तत्त्व का निरूपण करने वाले नाम से; द्वितीयः अध्यायः : दूसरा अध्याय

यथातथ अनुवाद

इस प्रकार, श्रीमद्भागवतम् महापुराण की पारमेश्वर्य संहिता में, प्रथम स्कन्ध में भगवद्भक्ति के तत्त्व का निरूपण करने वाला यह द्वितीय अध्याय है.

सरल भाव

इस प्रकार, भगवद्भक्ति के तत्त्व को स्पष्ट रूप से निरूपित करने वाला श्रीमद्भागवतम् के प्रथम स्कन्ध का यह द्वितीय अध्याय यहाँ समाप्त होता है.

“जहाँ भक्ति विकसित होती है, वहाँ संशय छिन्न-भिन्न हो जाता है.”

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